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Thursday, November 24, 2022

हम फिर मिलेंगे

 जिंदगी के आइने में धूल की परत जम गई है 

बहती उम्र की गति भी थम गई है ।

प्रति ध्वनी करते पर्वत , तुम्हारी अनुपस्थिति दर्ज करा रहे हैं 

बरसते मेघ,भोर के उड़ते पंछी, वो , व्यवहार नही दर्शा रहे हैं ।

तुम्हारी झील सी आँखों मे एक बार देखना चाहता हूँ 

समय का समंदर , चाहत का शहर 

भावों का बाज़ार , प्रीत की लहर 

उन्मुक्त घुमते थे जहाँ , दुनिया से बेखबर 

तभी वक्त ले गया हमें , जाने कहाँ किधर किधर

जाने कहाँ कहाँ किस देश मैं,  वैभव के परिवेश में 

तृष्णा के सैलाब में , इर्ष्या और द्वेष में 

जब  होश आया , अपने को अकेला  पाया  ।

जमाने भर की भीड थी , साथ न था अपना भी साया 

तुम से बिछड़ कर , कहाँ से कहाँ चला आया ।

आज अपने आप से , मैं बहुत सर्मिन्दा हूँ 

जिन्दगी जिन्दगी सी नही है पर जिन्दा हूँ ।

और जिन्दा है मेरे अंदर का एक कवि 

जो अंकुरित हुआ था तुम्हारे मिलने पर

गुलशन ज्यो महके फूलों के खिलने पर ।

जो कभी कलम की शक्ल में , कागज पर दौड़ जाता है ।

निर्जन वन में भी जिन्दगी के गीत गाता है

नाउम्मीदी के घने सैलाब में आशाओं के पुष्प उगाता है ।

तुम कहाँ हो तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर 

एक बार जी भरकर  रो लेना चाहता हूँ 

आंसुओ से वक्त के धूल की परत , को धो लेना चाहता हूँ 

तुम्हारे कंधे पर सर रख कर , थोडा सो लेना चाहता हूँ

वक्त ने पहरे बिठाये होंगे तुम्हारे इर्द गिर्द जरुर

फिर भी एक बार , तुम्हारा हो लेना चाहता हूँ

जब तक तुम नहीं मिलते , खोजूंगा निरंतर इस जन्म तक 

इस जन्म ही नहीं , बल्कि जन्मो, जन्मो तक 

पूछूंगा तरासे गए से ,पत्थरों  से महलों के खंडहरों से

पेड़, पौधों से, जंगलों से , गाँव गांव से और शहरों से

हम फिर मिलेंगे कहीं दूर , बहुत दूर, छितिज़ के उस पार 

संकुचित समाज से ऊपर , जहाँ हो चाहत का सँसार ।

शरीरों के बन्धनों से मुक्त ,जैविक  सोच से परे 

छल कपट दिखावे से हटकर जैसे कुंदन से खरे ।

हम फिर मिलेंगे , हम फिर मिलेंगे ।

                भाववन सिंह रावत  (दिल्ली)



Sunday, November 13, 2022

डर

 


               
सत्य घटना पर आधारित इस कहानी के पात्रों के नाम , स्थान अवश्य बदले हुए हैं ,लेकिन कहानी  का हर शब्द चीख चीख कर सच की गवाही दे रहा है । बात आज से चालीस साल पुरानी है । मैं और मेरा दोस्त नीरज दीपावली की छुट्टियाँ में तीन दिन की और छुट्टी लेकर एक हफ़्ते के लिए गांव जाने को तैयार हो गए । रात को दस बजे की रोडवेज़ की बस दिल्ली से पकड़ कर उत्तरांचल अपने गांव को रवाना हुए । पांच बजे सुबह हम लोग ऋषिकेश पहुंचे ,वहां से हमने गाड़ी बदली,और टिहरी की बस में रवाना हो गए ।उस जमाने मे परिवहन व्यवस्था इतनी सुलभ नही थी , आज की अपेक्षा  कहीं दूर की यात्रा में दुगने से भी ज्यादा समय लगता था ।
दो बजे नियत समय पर बस टिहरी पहुंच गई ,वहां से हमे गाँव के लिए बस पकड़नी थी ,जो हमे पाँच बजे तक गाँव के पास उतार देती ,मगर वह बस किसी कारणवश लेट हो गई ।  इंतजार करते करते शाम के पांच बजे गए । हमे अब यकीन हो गया कि हमे गाँव के पास पहुंचते पहुंचते रात हो जाएगी । सर्दी के मौसम में अंधेरा जल्दी हो जाता है ।
हमने बस पकड़ी ,ठीक सात बजे हम गाँव के नजदीक पहुंचे ,आगे का रास्ता पैदल का था घना जंगल और पहाड़ की चढ़ाई ,और उस पर रात का अंधेरा ,अकेला होता तो मैं कभी रात में नहींचलता , टिहरी में ही किसी होटल में रुक जाता मगर हम दो थे ,इस लिए हमने चलने का निश्चय किया था ।
बातचीत करते करते चलते रहेंगे ,ये सोच कर हमने अपना सामान उठाया और चल पड़े ,मेरे पास एक सूटकेस था जबकि  मेरे दोस्त  नीरज के पास सूटकेस और एक थैला भी था ।जंगली जानवरों का भय यहां अक्सर रहता है ,ये सुनने को मिलता था कि लकड़बग्गा आज फलां की बकरी  चपट कर गया किसी के कुत्ते को खा गया ,वगेरह वगेरह ।जब आदमी ऐसी परिस्तिथि में होता है तो ना याद आने वाली बातें भी याद आ जाती है ।और उस जमाने मे भूत प्रेतों की अधिक मान्यताएं होती थी । लोगों के द्वारा बताई गई आप बीती की घटनाएं इसी समय याद आती है । हम कड़ा मन करके चले जा रहे थे ,नीरज बोला " यार गोविंद तू डर तो नही रहा ना " ? मैंने कहा " अरे डरना कैसा जो डरता है उसी को ये सब दिखते हैं , तू भगवान का नाम ले और चलता रह " अपने डर को छिपाते मैंने कहा , "हाँ यहीं तो मैं कह रहा हूँ भूत भात कुछ नहीं होता " में समझ गया वह भी अपना डर छुपा रहा है , भूत के किस्से और घटनाएं बताने वालों में एक यह भी था । मगर इस समय ये बात कहने का कोई समय नहीं था ।आदमी कितना ही निडर क्यों ना हो , थोडे से डर की आशंका उसके मन मे अवस्य होती है । हम अपना डर छिपाए अपने आप को निडर घोषित करते चले जा रहे थे ।अंधेरे सन्नाटे में हमारी पदचाप और बात चीत दूर दूर तक सुनाई पड़ रही थी । जरा सी कहीं से आहट होती तो हम चौंक पड़ते , और एक दूसरे को डरपोक बताने का नाटक करते ,  मेरे मन मे आया कि इससे तो अच्छा था टिहरी में किसी होटल में रुक जाते , सुबह आराम से आते , मगर एक दिन की छुट्टी बेकार हो जाती ,खैर अब आ ही गये तो घर तो पहुंचना ही है , मैंने अपनी सुविधा के लिए एक डंडा चाय वाले कि दुकान से ले लिया था ,शायद इसकी जरूरत पड़ जाय ।बीच बीच मे कुछ जंगली जानवरों की आवाजें हल्की हल्की आती थी मगर सामने कोई अब तक नही आया । चलते चलते नीरज अचानक रुक गया ,ऐसे जैसे बस को ब्रेक लगता हो । मैंने पूछा तो नीरज बोला "प्रकाश देख तो वहां पर कौन बैठा है "
"कहां पर " मैंने कहा "अरे वो देख उस दीवार के बड़े पत्थर पर"मैंने देखा सचमुच दूर से ऐसा लगता था जैसे कोई बैठा हो , दिन के समय कोई राहगीर चलते चलते थक जाते तो उस जगह बैठ जाते थे , वहां पर एक छोटा पेड़ भी था ,जिसकी छांव में बैठ कर आने जाने वाले थोड़ी देर आराम करते थे , गाँव की स्त्रियां जब दूर जंगल से लकड़ियां या घास लेकर आती थी तो यहां पर बैठ कर थोड़ी देर विश्राम करती थी ।ठीक उसी जगह पर मैंने देखा एक आदमी घुटने में मुँह दे कर बैठ था ,उसे इस तरह बैठा देख कर एक बार तो हमारे होश उड़ गए ,वह हम से पचास मीटर की दूरी पर था ,क्या उसे हमारी आवाज सुनाई नही पड़ी ,हम तो जोर जोर से बातें कर रहे थे ।नीरज डर कर मेरे पीछे हो गया। , डर से या फिर हिम्मत से मेरे हाथ की पकड़ डंडे पर मजबूत हो गई । मैं चिल्लाया "कौन है वहां पर " कोई जवाब नहीं आया , तो हमारे होश हवा हो गए , तब एक पत्थर उठा कर मैंने हल्के से उसकी तरफ उछाला ताकि  पत्थर की आवाज से उसे हमारा आभास हो सके । तब उस आदमी ने जोर से हंसते हुए अपना मुह ऊपर किया , "डर गए क्या " वह बोला ।"अरे भाई कौन हो तुम "मैंने कहा "तुमने तो डरा ही दिया था "मैंने अपने को संयत करते हुए कहा । नीरज के चेहरे पर पसीना आ गया था । हम नजदीक आये तो देखा वह एक पचास पचपन साल का दुबला पतला आदमी था ,फिर वह खींसे निपोरता बोला "डरो मत देखो मैं तो अकेला हूं ,तुम तो दो हो 'तब नीरज अपने डर को छिपाता हुआ बोला " हम डर कहां रहे थे ", " हमने सोचा कोई चोर है " । चलो अब साथ चलते हैं ,वह लाठी के सहारे खड़ा हुआ ,और बोला मैं पटुडी गांव का हूँ ,पटुडी गांव हमारे गांव धारकोट से बाद में पड़ता था ,तो क्या ये आदमी वहां तक अकेले ही जायेगा ? हमे आश्चर्य हुआ , पर ये समय ये सब सोचने का नही था । हम एक साथी के मिल जाने से काफी  आस्वस्त हुए , एक उम्र दराज आदमी के मिलने से अब वह पहले जैसा डर नही रह गया था ,अब हम बेफिक्र हो कर चल रहे थे । हम दोनो पच्चीस छब्बीस साल के और वह वृद्ध आदमी हम से दुगनी उम्र का था, हम लोग बातें करते करते चल रहे थे तो उसने हमें भूतो की बातें बताई , " भूत ऐसे नही दिखते जैसा आदमी सोचता है ,भूत अलग अलग रूप में दिखता है , कभी कभी आदमी सोचता है कि भूत नही है पर भूत उसके साथ ही  विधमान रहता है " ।वगेरह वगेरह । उसकी अजीब बातें दिलचस्प भी थी और डराने वाली भी , खैर बात करते करते उसने हमारे गांव के एक दी आदमियों के नाम बताए और कहा कि वह हमारे जानने वाले हैं , तब हमें पूरा यकीन हो गया कि वह सींवाली गांव का है । थोड़ी देर बाद हम लोग अपने गांव की सरहद में पहुंच गए । आठ बजे चुके थे , उसने अपना नाम श्याम सिंह बताया था । जब हमारे गांव का रास्ता अलग हुआ तो  तो मैंने कहा  " अच्छा श्याम सिंह जी  आप आराम से जाइये ,हमारा तो गांव आ गया है "। तब वह बोला ठीक है मैं चलता हूँ ,और वह बे झिझक आगे रास्ते पर चल  पड़ा और अंधेरे में गायब हो गया ,  मैंने देखा उसका व्यवहार ऐसा था जैसे उसके लिए रात का अंधेरा कोई अहमियत ना रखता हो । मुझे वह बहुत बहादुर और हिम्मत वाला आदमी लगा । हमने ईश्वर का धन्यवाद किया ,कि हमे एक साथी और मिल गया था । रास्ते के थोड़ा ऊपर एक छोटी दुकान थी ,जो रात आठ नौ बजे तक खुली रहती थी ,लोग दीपू चाचा की दुकान पर देर तक गप शप्प किया करते थे , हम दुकान पर पहुंचे तो देखा दीपू चाचा के अलावा दो आदमी वहां और बैठे थे । रामा रूमी के बाद चाचा बोले "अरे प्रकाश,नीरज तुम अकेले ही आ रहे हो क्या ? "
मैने कहा "हाँ चाचा हमारे साथ एक आदमी और था"
"कौन था तुम्हारे साथ " दीपू चाचा बोले ,तब मैंने कहा कि पटुडी गांव का कोई श्याम सिंह था ,अभी तो गया है उस तरफ । दीपू चाचा ने कहा रात को इस तरह मत आया करो ,टिहरी में रुक जाते ,चलो ठीक है में भी दुकान बंद कर रहा हूँ ,टाइम हो गया है।और सब उठ कर चलने लगे । हम भी अपने घर आ गए । सुबह नाहा धो कर मैं दीवाली का सामान लेने जाने लगा तो नीरज को आवाज दे कर आने का कहा ,हम दोनो दुकान पर पहुंचे तो दुकान पर दीपू चाचा बैठे थे । तब उन्होंने बताया कि तुम्हे रात को पैदल इस तरह नही आना चाहिए ,"पर चाचा हमे तो कोई दिक्कत नही हुई" ,। मैने कहा । "और अगर कुछ हो जाता तो चाचा बोले मैंने तुम्हें रात में नही बताया , तुम जिस श्याम सिंह  की बात कर रहे थे ,जिसके साथ तुम लोग आधा घंटे तक चलते रहे ,जानते हो उसे मेरे हुए चार महीने हो गए हैं , आये दिन वह रात को लोगों के साथ इसी तरह चलता है"। "क्या " मेरे मुह से जैसे चीख़ निकल गई ,और पैरों तले जमीन खिसक गई ।नीरज तो जैसे बेहोस  सा हो गया । उसका मुह खुला का खुला रह गया ।  "हे भगवान तो क्या वह असल मे भूत था " ?
" हाँ वो वही था ,तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि तुम्हे कुछ हुआ नही "।उस दिन मैं समझा कि डर क्या होता है,वो जो हमने कल रात महसूस किया या वो जिसका अहसास हमे अब हो रहा था ।उस दिन के बाद हम कभी रात को उस समय उस रास्ते नही चले ,बाद में कभी अगर दिन में भी उस जगह चलना पड़ता तो शरीर में डर  की एक लहर सी दौड़ जाती थी ।

                             भगवान सिंह रावत  ( दिल्ली )
                                  

Sunday, November 6, 2022

अनजाने रिश्ते


 सुबह के आठ बजकर पैंतालीस मिनट हुए हैं । जगह ओखला औधोगिक परिसर ,शेड टाइप फैक्टरियां । एक के बाद एक फैक्टरियां लगभग किलो मीटर दूर तक ।नौ बजने में अभी समय था ।फैक्टरियों के कर्मचारी बाहर बैठ कर नौ बजने का इंतजार कर रहे थे ।फैक्टरियां मे काम नौ बजे से सुरु होता है ।

एक तीस बत्तीस साल की महिला तभी वहां से गुजरती है,शलवार कमीज में चुप चाप चलती हुई जल्दी जल्दी,एक फैक्ट्री के आगे दो चार वृद्ध व्यक्ति और पांच छै जवान बीस पच्चीस साल के युवक नौ बजने का इंतजार कर रहे थे ।तभी उनमे से एक युवक बोला अरे "अजीत ले  आगई आंखें सेक ले '।"अरे कहां "अजीत  बोला "वो आरही है ना" पहला बोला , फिर जब वह नजदीक आई तो अजीत ने एक फिल्मी गाना छेड़ने के अंदाज में गाना सुरु किया ,अकेले....अकेले....कहां जा रहे हो ।वहां पर कुछ युवक हंसने लगे । वह महिला चुप चाप चलती रही ,और आगे बढ़ गई ।और एक गारमेंट की फैक्ट्री के अंदर चली गई ।वह अपनी मशीन के पास गई और बैग एक तरफ रख कर अपने काम मे लग गई ।फैक्ट्री में और भी महिलाएं थी ।

उर्मिला नाम था उसका , ये छेडाखानी तो अब रोज का काम हो गया सुन कर अन सुना कर देती है अब वह ,किस किस को  क्या कहें , अकेली औरत को देख कर लोग जहां भी मिले फिकरे कश देते हैं ।अकेली औरत का बाहर निकलना दूभर हो गया है ।उस फैक्टरी के आगे कुछ ज्यादा ही जमघट लगा रहता है ।रोज कुछ न कुछ हल्की आवाज में कोई न कोई अपशब्द कह देता है । रोज मर्रा की तरह उर्मिला अपने काम मे लग गई ।उर्मिला की किस्मत है कि कभी कभी वो मनचले युवक वहां पर नही होते,शायद देर से आते होंगे या फिर उर्मिला जल्दी आ जाती होगी , वह कोशिस जल्दी आने की करती थी ,ताकि उन फिकरे कसने वालों से बच सके मगर हफ़्ते में दो तीन दिन  वो मिल ही जाते थे।उर्मिला अब इस तरह के उत्पीड़न की आदि हो गई थी । एक दिन ठीक उसी समय उर्मिला तेज कदमों से फैक्ट्री की तरफ बढ़ी चली जा रही थी ,उस फैक्ट्री के सामने आते ही उसकी जान सूख जाती थी,पता नही कोई क्या कह दे ।तभी वहां पर बैठे अजीत को बगल में खड़े सुदेश ने कहा "अरे यार अजीत हिसाब किताब आ गया देख" ,अजीत ने देखा तो शायराना अंदाज में  बोला  "जाने वाले आजा तेरी याद सताए " पास में बैठे एक वृद्ध युवक ने कहा 

"अरे बावलों तम रोज इसी हरकतें करो हो ,इस्ते का फायदा , काऊ दिन जाके ढंग से वासे बात क्यों ना कर लेते " तभी दूसरा बोला  "अरे चाचा ठीक कहवे है, जाके वा से बात करणी चहिये  तोये " ।

उर्मिला के कान में ये बातें तीर सी चुभ रही थी ,वह तेज कदमों से चलने लगी,"हराम जादे ,पता नही मुझे क्या समझते है "।वह अपमान का घूंट पीकर रुवांसी सी हो गई थी ।

शाम को वापस घर की तरफ आते उर्मिला को उस फैक्ट्री के पास अजीत को खड़ा पाया । तो वे एक दम चौंक गईं, अब शाम को भी ये लोग बाज नही आएंगे ।शाम को आज तक कोई नही मिलता था सब अपने घर जा चुके होते थे ।वह अनदेखा कर उसके बगल से गुजरकर निकली ।,तब वह बोला "मैडम जी " वह सीधी चलती रही ,वह भी पीछे चलने लगा ",मैंने कहा मैडम जी सुनो तो " अजीत बोला वह कुछ सोच कर रुक गई ,"क्या बात है बोलो " "में ये पूछ रहा था आप कौनसी फैक्ट्री में काम करती है "। उरमिला ने कहा "क्यों वहां पर भी छेड खानी करोगे क्या " अजित बोला "अरे नही ये बात नही वैसे ही पूछ रहा हूँ" ,  "ऐसे ही क्यों "उर्मिला बोली । "वो इसलिए कि आप इतनी मेहनत करती हैं ,रोज सुबह सुबह फैक्ट्री जाती हैं , आपके घर मे और कोई काम करने वाला नही है क्या '। अजित  बोला " हाँ है घर मे , पर इससे तुम्हे क्या मतलब "उर्मिला बोली ।

अजित को बात करने का सूत्र मिल गया था ,बात आगे बढ़ाते वह बोला " देखिए आप बुरा मत मानिए "बुरा नही मांन रही हूं ,अनजान लोगों से इतनी घनिष्टता कौन दिखाता है" वह बोली

अब बात में अजीत को  मजा आने लगा था ।आप कहाँ पर रहती हैं ।वह बोला "हरकेश नजर में रहती हूं ना "उर्मिला  ने बताया । " वहां से थोड़ी दूर नेहरू प्लेस में तो मैं भी रहता हूँ  कभी आइए न " अजीत ने कहा "जरूर आऊंगी " उर्मिला बोली चलते चलते काफी दूर आ गए थे । अजीत को एकाऐक विश्वास नही हुआ,कि एक मुलाकात में उर्मिला ऐसा कह देगी , थोड़ी देर इधर उधर की बाते हुईं ,फिर दोनों अचानक रुक गए । यहां से एक रास्ता नेहरू प्लेस की और जाता था और  एक हरकेश नगर को , तब अजीत बोला "अच्छा अब चलते हैं ,आपसे मिल कर अच्छा लगा कल मिलोगी क्या " दोनो रुक गए ।अजीत इतना सानिध्य पाकर खुश हो रहा था।"ठीक है मिल जाऊँगी ,मेरा घर पास में ही है " उर्मिला बोली ।"अच्छा आएंगे आपके घर कभी "अपने मन के उफनते आवेश को दबाता अजीत  बोला,

"अरे चलिए ना अभी चाय पी कर आ जाना "उर्मिला के स्वर में मुशकुराहट और आग्रह दोनो थे । अजीत का मन बल्लियों उछल गया ,उसकी खुशी का ठिकाना न रहा ।उसे मन की मुराद मिल गई थी "चलो फिर आज आपके हाथ की चाय भी पी लेते हैं" और दोनों चल पड़े ।अजीत ने सोचा शायद अभी इसके घर पर कोई नही रहता होगा, कोई चीज इतनी आसानी से मिल जाती है तब कितनी खुशी होती  है वैसा ही हाल अजीत का था । थोड़ी दूर जाकर हरकेश नगर बस्ती आई। एक पुराने से मकान में पाँच छै कमरे थे । उनमें एक कमरे में दोनों चले गए ।कमरे में जाते ही अजीत ने देखा तो आश्चर्य से भर गया ।एक खाट पर एक बीमार सा व्यक्ति लेटा  था ,पास में एक बूढ़ी महिला बैठी  थी । जिसकी गोद एक दो साल का एक बच्चा खेल रहा था ।आते ही उर्मिला बोली आओ साहब और तब उर्मिला उस बूढीऔरत की तरफ इशारा कर बोली ये मेरी सास हैं ,और ये चारपाई पर लेटे मेरे पति हैं बीमार हैं,बस चारपाई पर पड़े रहते है ।तब उसने बुढ़ी महिला को कहा मा जी ये हमारी फैक्ट्री में सुपरवाईजर हैं ।उरमिला ने झुठ बोल दिया ,यहां हरकेध नजर में इनको कोई काम था तो यहां आ गए ।उसने एक पुरानी सी कुर्सी अजित की तरफ सरका कर कहा आप बैठो में चाय बनाती हूँ ।और कमरे में ही बनी छोटी किचन में जाकर चाय बनाने लगी ।तब तक अजीत बैठा  एक अजीब अन्तर्ध्वन्द  में  फंसा सोच में डूब रहा ।क्या सोचा था उसने और क्या देखने को मिल रहा है । स्टूल आगे कर उर्मिला चाय उसे देते,दूसरे स्टूल पर पर बैठते बोली,"बस साहब यही है अपनी छोटी सी जिंदगी ।ये किराये का कमरा है ,हम चारों लोग यहां रहते है , तीन साल पहले मेरा ब्याह हुआ था ,मेरे पति उसी फैक्टरी मे काम करते थ जहां मैं काम करती हूँ , कुछ दिन हंसी खुसी बीत गए,एक लड़का भी हुआ ,फिर अचानक इनको लकवा मार गया,एक हाथ और एक पैर बिल्कुल सुन्न पड गए हैं ,बहुत इलाज कराया मगर कुछ फायदा नही हुआ ,फैक्ट्री के मालिक ने मुझ पर दया कर काम पर रख लिया ।अब माजी की , बच्चे की और इनकी जिम्मेवारी मेरी है,इनकी दवाई भी चल रही है,फैक्टरी से आकर खाना बनाती हूँ सुबह सबके लिए बनाकर जाती हूँ किसी तरह गुजारा चल रही है बस " । उर्मिला उसका और अपना चाय का कप उठा कर किचन में चली गई ।अजीत सोच में पड़ गया ,वह आत्मग्लानि से भर उठा ,धिक्कार है...धिक्कार...... है तेरे लिए अजीत ,जैसे उसके अंदर से एक आवाज आई , तेरी भी तो एक छोटी बहन है कुसुम ,अगर उसके साथ शादी केबाद ऐसा हो जाए तो ....तब तुझे कैसा  लगेगा ।नही.... नही...उसका जमीर उसे धिक्कारने लगा ,उसकी आत्मा जाग उठी , बेचारी उर्मिला इतनी विवशताओं में जीने को मजबूर है ।फिर भी अपने धर्म का पालन कितनी सादकी से निभा रही है ।और हम ....हम तो कितने तुच्छ है  कितने बौने हैं ,कितने नीच हैं कितने गंदे हैं ।अपने आप को जाने कितनी गालियां दे डाली उसने ,अब उसे उर्मिला की जगह उसकी बहन कुसुम  नजर आने लगी थी,मानो कुसुम उसी फैक्ट्री के रास्ते जा रही हो ,और लोग उसे छेड़ रहे हो  और वह देख रहा हो ।नही.....नही....उसने अपनी आंखों पर हाथ रख दिये और फिर चेहरा हथेलियों में छुपा लिया ।तभी उर्मिला की आवाज आई क्या हुआ साहब ....।वह चौंका , "नही कुछ नही,में चलता हूँ " ,और वह उठने लगा "क्या तबियत ठीक नहीं " ? उर्मिला बोली "नही ऐसी बात नही,मुझे कुछ काम याद आ गया है "अजीत ने जबाब ढिया । वह चलने लगा तो उर्मिला उसके साथ बाहर आई ,मकान के बाहर आकर अचानक अजीत रुका  और उर्मिला की तरफ देख कर बोला ,मुझे माफ़ कर दो उर्मिला जी ,और हाथ जोड़कर बोला " मुझे नही मालूम था कि जिंदगी का एक पहलू ऐसा भी होगा , आप इतनी मुश्किलों में जीवन के मूल्यों को इतनी सहजता से निभा रही हैं,वह प्रशंसा के काबिल है,आप जीवन के प्रति इतना संघर्ष कर रही हैंऔर ये समाज आपको बजाय सराहना करने के प्रताड़ित कर रहा है । हम आपके समक्ष पैर की धूल के समान है ", " फिर रुआंसा होकर बोला हम सब आपकी क्षमा के भी काबिल नही है ,आप मेरी छोटी बहन कुसुम जैसी है ,आज से मैं आपका भाई जैसा हूँ आपको कोई आते जाते कुछ नही कहेगा अब,आप निसंकोच और बेफिक्र हो कर  चलना ,और इस भाई से जो भी मदद बन पड़ेगी ,में अवश्य करूंगा " ।यह कर उसकी आँखों से आंसु पश्चाताप बन कर बहने लगे ,उससे कुछ कहते ना बन पड़ा , उसकी आत्मा ने उसे झकझोर कर रख दिया था । उर्मिला इस बदलाव को देख कर चकित हो गई थी , वह उसे हकीकत दिखाने को यहां लाई थी ,पर इतना परिवर्तन देख कर वह गदगद हो उठी ,और बोली  "भैया आपने इतना समझ  लिया ,मेरे लिए इतना ही बहुत है " , तब अजीत ने अपना एक हाथ उठा कर उर्मिला के सिर पर रखा और वहां से चल पड़ा,उर्मिला भी नम आंखों से बहुत देर तक उसे जाते देखती रही ।उसने देखा अजीत बार बार रुमाल से अपनी आंखें पोंछ रहा था । एक अनजाने अजनबी से  रिश्ते का अहसास इतना सुखद होगा  उसे पता ना था  । कितने भावुक होते हैं ऐसे रिश्ते ,तब वह वापस कमरे की तरफ बढ़ी ,और काम मे लग गई ।