सुबह के आठ बजकर पैंतालीस मिनट हुए हैं । जगह ओखला औधोगिक परिसर ,शेड टाइप फैक्टरियां । एक के बाद एक फैक्टरियां लगभग किलो मीटर दूर तक ।नौ बजने में अभी समय था ।फैक्टरियों के कर्मचारी बाहर बैठ कर नौ बजने का इंतजार कर रहे थे ।फैक्टरियां मे काम नौ बजे से सुरु होता है ।
एक तीस बत्तीस साल की महिला तभी वहां से गुजरती है,शलवार कमीज में चुप चाप चलती हुई जल्दी जल्दी,एक फैक्ट्री के आगे दो चार वृद्ध व्यक्ति और पांच छै जवान बीस पच्चीस साल के युवक नौ बजने का इंतजार कर रहे थे ।तभी उनमे से एक युवक बोला अरे "अजीत ले आगई आंखें सेक ले '।"अरे कहां "अजीत बोला "वो आरही है ना" पहला बोला , फिर जब वह नजदीक आई तो अजीत ने एक फिल्मी गाना छेड़ने के अंदाज में गाना सुरु किया ,अकेले....अकेले....कहां जा रहे हो ।वहां पर कुछ युवक हंसने लगे । वह महिला चुप चाप चलती रही ,और आगे बढ़ गई ।और एक गारमेंट की फैक्ट्री के अंदर चली गई ।वह अपनी मशीन के पास गई और बैग एक तरफ रख कर अपने काम मे लग गई ।फैक्ट्री में और भी महिलाएं थी ।
उर्मिला नाम था उसका , ये छेडाखानी तो अब रोज का काम हो गया सुन कर अन सुना कर देती है अब वह ,किस किस को क्या कहें , अकेली औरत को देख कर लोग जहां भी मिले फिकरे कश देते हैं ।अकेली औरत का बाहर निकलना दूभर हो गया है ।उस फैक्टरी के आगे कुछ ज्यादा ही जमघट लगा रहता है ।रोज कुछ न कुछ हल्की आवाज में कोई न कोई अपशब्द कह देता है । रोज मर्रा की तरह उर्मिला अपने काम मे लग गई ।उर्मिला की किस्मत है कि कभी कभी वो मनचले युवक वहां पर नही होते,शायद देर से आते होंगे या फिर उर्मिला जल्दी आ जाती होगी , वह कोशिस जल्दी आने की करती थी ,ताकि उन फिकरे कसने वालों से बच सके मगर हफ़्ते में दो तीन दिन वो मिल ही जाते थे।उर्मिला अब इस तरह के उत्पीड़न की आदि हो गई थी । एक दिन ठीक उसी समय उर्मिला तेज कदमों से फैक्ट्री की तरफ बढ़ी चली जा रही थी ,उस फैक्ट्री के सामने आते ही उसकी जान सूख जाती थी,पता नही कोई क्या कह दे ।तभी वहां पर बैठे अजीत को बगल में खड़े सुदेश ने कहा "अरे यार अजीत हिसाब किताब आ गया देख" ,अजीत ने देखा तो शायराना अंदाज में बोला "जाने वाले आजा तेरी याद सताए " पास में बैठे एक वृद्ध युवक ने कहा
"अरे बावलों तम रोज इसी हरकतें करो हो ,इस्ते का फायदा , काऊ दिन जाके ढंग से वासे बात क्यों ना कर लेते " तभी दूसरा बोला "अरे चाचा ठीक कहवे है, जाके वा से बात करणी चहिये तोये " ।
उर्मिला के कान में ये बातें तीर सी चुभ रही थी ,वह तेज कदमों से चलने लगी,"हराम जादे ,पता नही मुझे क्या समझते है "।वह अपमान का घूंट पीकर रुवांसी सी हो गई थी ।
शाम को वापस घर की तरफ आते उर्मिला को उस फैक्ट्री के पास अजीत को खड़ा पाया । तो वे एक दम चौंक गईं, अब शाम को भी ये लोग बाज नही आएंगे ।शाम को आज तक कोई नही मिलता था सब अपने घर जा चुके होते थे ।वह अनदेखा कर उसके बगल से गुजरकर निकली ।,तब वह बोला "मैडम जी " वह सीधी चलती रही ,वह भी पीछे चलने लगा ",मैंने कहा मैडम जी सुनो तो " अजीत बोला वह कुछ सोच कर रुक गई ,"क्या बात है बोलो " "में ये पूछ रहा था आप कौनसी फैक्ट्री में काम करती है "। उरमिला ने कहा "क्यों वहां पर भी छेड खानी करोगे क्या " अजित बोला "अरे नही ये बात नही वैसे ही पूछ रहा हूँ" , "ऐसे ही क्यों "उर्मिला बोली । "वो इसलिए कि आप इतनी मेहनत करती हैं ,रोज सुबह सुबह फैक्ट्री जाती हैं , आपके घर मे और कोई काम करने वाला नही है क्या '। अजित बोला " हाँ है घर मे , पर इससे तुम्हे क्या मतलब "उर्मिला बोली ।
अजित को बात करने का सूत्र मिल गया था ,बात आगे बढ़ाते वह बोला " देखिए आप बुरा मत मानिए "बुरा नही मांन रही हूं ,अनजान लोगों से इतनी घनिष्टता कौन दिखाता है" वह बोली
अब बात में अजीत को मजा आने लगा था ।आप कहाँ पर रहती हैं ।वह बोला "हरकेश नजर में रहती हूं ना "उर्मिला ने बताया । " वहां से थोड़ी दूर नेहरू प्लेस में तो मैं भी रहता हूँ कभी आइए न " अजीत ने कहा "जरूर आऊंगी " उर्मिला बोली चलते चलते काफी दूर आ गए थे । अजीत को एकाऐक विश्वास नही हुआ,कि एक मुलाकात में उर्मिला ऐसा कह देगी , थोड़ी देर इधर उधर की बाते हुईं ,फिर दोनों अचानक रुक गए । यहां से एक रास्ता नेहरू प्लेस की और जाता था और एक हरकेश नगर को , तब अजीत बोला "अच्छा अब चलते हैं ,आपसे मिल कर अच्छा लगा कल मिलोगी क्या " दोनो रुक गए ।अजीत इतना सानिध्य पाकर खुश हो रहा था।"ठीक है मिल जाऊँगी ,मेरा घर पास में ही है " उर्मिला बोली ।"अच्छा आएंगे आपके घर कभी "अपने मन के उफनते आवेश को दबाता अजीत बोला,
"अरे चलिए ना अभी चाय पी कर आ जाना "उर्मिला के स्वर में मुशकुराहट और आग्रह दोनो थे । अजीत का मन बल्लियों उछल गया ,उसकी खुशी का ठिकाना न रहा ।उसे मन की मुराद मिल गई थी "चलो फिर आज आपके हाथ की चाय भी पी लेते हैं" और दोनों चल पड़े ।अजीत ने सोचा शायद अभी इसके घर पर कोई नही रहता होगा, कोई चीज इतनी आसानी से मिल जाती है तब कितनी खुशी होती है वैसा ही हाल अजीत का था । थोड़ी दूर जाकर हरकेश नगर बस्ती आई। एक पुराने से मकान में पाँच छै कमरे थे । उनमें एक कमरे में दोनों चले गए ।कमरे में जाते ही अजीत ने देखा तो आश्चर्य से भर गया ।एक खाट पर एक बीमार सा व्यक्ति लेटा था ,पास में एक बूढ़ी महिला बैठी थी । जिसकी गोद एक दो साल का एक बच्चा खेल रहा था ।आते ही उर्मिला बोली आओ साहब और तब उर्मिला उस बूढीऔरत की तरफ इशारा कर बोली ये मेरी सास हैं ,और ये चारपाई पर लेटे मेरे पति हैं बीमार हैं,बस चारपाई पर पड़े रहते है ।तब उसने बुढ़ी महिला को कहा मा जी ये हमारी फैक्ट्री में सुपरवाईजर हैं ।उरमिला ने झुठ बोल दिया ,यहां हरकेध नजर में इनको कोई काम था तो यहां आ गए ।उसने एक पुरानी सी कुर्सी अजित की तरफ सरका कर कहा आप बैठो में चाय बनाती हूँ ।और कमरे में ही बनी छोटी किचन में जाकर चाय बनाने लगी ।तब तक अजीत बैठा एक अजीब अन्तर्ध्वन्द में फंसा सोच में डूब रहा ।क्या सोचा था उसने और क्या देखने को मिल रहा है । स्टूल आगे कर उर्मिला चाय उसे देते,दूसरे स्टूल पर पर बैठते बोली,"बस साहब यही है अपनी छोटी सी जिंदगी ।ये किराये का कमरा है ,हम चारों लोग यहां रहते है , तीन साल पहले मेरा ब्याह हुआ था ,मेरे पति उसी फैक्टरी मे काम करते थ जहां मैं काम करती हूँ , कुछ दिन हंसी खुसी बीत गए,एक लड़का भी हुआ ,फिर अचानक इनको लकवा मार गया,एक हाथ और एक पैर बिल्कुल सुन्न पड गए हैं ,बहुत इलाज कराया मगर कुछ फायदा नही हुआ ,फैक्ट्री के मालिक ने मुझ पर दया कर काम पर रख लिया ।अब माजी की , बच्चे की और इनकी जिम्मेवारी मेरी है,इनकी दवाई भी चल रही है,फैक्टरी से आकर खाना बनाती हूँ सुबह सबके लिए बनाकर जाती हूँ किसी तरह गुजारा चल रही है बस " । उर्मिला उसका और अपना चाय का कप उठा कर किचन में चली गई ।अजीत सोच में पड़ गया ,वह आत्मग्लानि से भर उठा ,धिक्कार है...धिक्कार...... है तेरे लिए अजीत ,जैसे उसके अंदर से एक आवाज आई , तेरी भी तो एक छोटी बहन है कुसुम ,अगर उसके साथ शादी केबाद ऐसा हो जाए तो ....तब तुझे कैसा लगेगा ।नही.... नही...उसका जमीर उसे धिक्कारने लगा ,उसकी आत्मा जाग उठी , बेचारी उर्मिला इतनी विवशताओं में जीने को मजबूर है ।फिर भी अपने धर्म का पालन कितनी सादकी से निभा रही है ।और हम ....हम तो कितने तुच्छ है कितने बौने हैं ,कितने नीच हैं कितने गंदे हैं ।अपने आप को जाने कितनी गालियां दे डाली उसने ,अब उसे उर्मिला की जगह उसकी बहन कुसुम नजर आने लगी थी,मानो कुसुम उसी फैक्ट्री के रास्ते जा रही हो ,और लोग उसे छेड़ रहे हो और वह देख रहा हो ।नही.....नही....उसने अपनी आंखों पर हाथ रख दिये और फिर चेहरा हथेलियों में छुपा लिया ।तभी उर्मिला की आवाज आई क्या हुआ साहब ....।वह चौंका , "नही कुछ नही,में चलता हूँ " ,और वह उठने लगा "क्या तबियत ठीक नहीं " ? उर्मिला बोली "नही ऐसी बात नही,मुझे कुछ काम याद आ गया है "अजीत ने जबाब ढिया । वह चलने लगा तो उर्मिला उसके साथ बाहर आई ,मकान के बाहर आकर अचानक अजीत रुका और उर्मिला की तरफ देख कर बोला ,मुझे माफ़ कर दो उर्मिला जी ,और हाथ जोड़कर बोला " मुझे नही मालूम था कि जिंदगी का एक पहलू ऐसा भी होगा , आप इतनी मुश्किलों में जीवन के मूल्यों को इतनी सहजता से निभा रही हैं,वह प्रशंसा के काबिल है,आप जीवन के प्रति इतना संघर्ष कर रही हैंऔर ये समाज आपको बजाय सराहना करने के प्रताड़ित कर रहा है । हम आपके समक्ष पैर की धूल के समान है ", " फिर रुआंसा होकर बोला हम सब आपकी क्षमा के भी काबिल नही है ,आप मेरी छोटी बहन कुसुम जैसी है ,आज से मैं आपका भाई जैसा हूँ आपको कोई आते जाते कुछ नही कहेगा अब,आप निसंकोच और बेफिक्र हो कर चलना ,और इस भाई से जो भी मदद बन पड़ेगी ,में अवश्य करूंगा " ।यह कर उसकी आँखों से आंसु पश्चाताप बन कर बहने लगे ,उससे कुछ कहते ना बन पड़ा , उसकी आत्मा ने उसे झकझोर कर रख दिया था । उर्मिला इस बदलाव को देख कर चकित हो गई थी , वह उसे हकीकत दिखाने को यहां लाई थी ,पर इतना परिवर्तन देख कर वह गदगद हो उठी ,और बोली "भैया आपने इतना समझ लिया ,मेरे लिए इतना ही बहुत है " , तब अजीत ने अपना एक हाथ उठा कर उर्मिला के सिर पर रखा और वहां से चल पड़ा,उर्मिला भी नम आंखों से बहुत देर तक उसे जाते देखती रही ।उसने देखा अजीत बार बार रुमाल से अपनी आंखें पोंछ रहा था । एक अनजाने अजनबी से रिश्ते का अहसास इतना सुखद होगा उसे पता ना था । कितने भावुक होते हैं ऐसे रिश्ते ,तब वह वापस कमरे की तरफ बढ़ी ,और काम मे लग गई ।