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Tuesday, August 8, 2017

चल दूर कहीं चलते हैं |

चल दूर कहीं चलते हैं  
जहाँ रात नहीं होती है 
दिन कभी नहीं ढलते हैं  | 
जहाँ अन्न का कोई तोल  नहीं 
रोटी का कोई मोल नहीं 
दिलों में सरहद पैदा करदे 
ऐसा कोई भूगोल नहीं 
नफरत का सैलाब  नहीं 
प्यार के दिए जलते हैं  | चल दूर कहीं। ..... | 
जहाँ दुविधा में  इंसान नहीं  
बिका हुआ ईमान नहीं 
साधु के चोले  में कोई 
छिपा हुआ शैतान  नहीं 
वक्त भले ही बदले लेकिन 
चेहरे नहीं बदलते हैं   चल दूर कहीं। ..... | 
सुविद्या से लाचार  नहीं 
मन से कोई बीमार नहीं 
उजले स्वेत वस्त्रों के पीछे 
कोई काली सरकार नहीं 
बिना गबन घोटालों के जहाँ 
रोज अख़बार निकलते हैं   चल दूर कहीं। ..... | 
जहाँ कोई कहीं गुरूर नहीं 
धर्म दया से दूर नहीं 
मद मैं आकर प्रतिभाएं 
वैभव में कहीं चूर नहीं 
करुणा से संताप मिटाकर 
हर्ष के अश्रु निकलते हैं  | 
चल दूर कहीं चलते हैं 
जहाँ रात नहीं होती है 

 दिन कभी नहीं ढलते हैं 

चल दूर कहीं चलते हैं | 
                                भगवान सिंह रावत  (सर्वाधिकार सुरक्षित )


Sunday, April 9, 2017

अब आ भी जाओ

कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
जंतर मंतर जादू टोना
छान लिया धरती का कोना
भीड़ भरे इस कोलाहल में
नहीं दिखा वो रूप सलोना
गांव गांव और शहर शहर में
जंगल बीहड़ नगर नगर में
निष्ठुर बन कर बैठे हो तुम
गुमनामी की किसी डगर में
चमन से और बहार से पूछा
फूलों की कतार से पूछा
जंगल के सैलाब से पूछा
नदिओं की हर धार से पूछा
धरा के हर कण कण में देखा
खंडहर के  अम्बार से पूछा
निशा दिवस में कहीं नहीं थे
सावन की फुहार से पूछा
थक कर बोझिल मन से आखिर
निर्मोही संसार से पूछा 
मायूसी के झंझावात में
क्यों जकड़े हो मुझे बताओ बताओ
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
बर्फीला गिरिराज  पुकारे
गुमसुम जो  सांज पुकारे
वन उपवन सब  अलसाये हैं
घायल  सा ऋतुराज पुकारे
फूलों में वो बात कहाँ है
गीतों में जज्बात कहाँ है
बिना तुम्हारे लिख पाऊं मैं 
ऐसे भी हालात कहाँ हैं
उम्र बह रही पानी जैसे
रोक सकूँ औकात कहाँ है
झुलसा रही है विरह वेदना
भादों की बरसात कहाँ है
बीते दिन महीने साल
पर तुमको कुछ कहाँ मलाल
सर्द  हवाएँ चुभती हैं अब
बेगाने  से झरने, ताल
हरे भरे इस मौसम में  भी
पतझड़ सा है दिल का हाल
रिम झिम रिम झिम करता सावन
बहुत रुलाता है हर साल
कर लूँगा पहचान तुम्हारी
प्यार का कोई गीत सुनाओ
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
काश अभी गर  तुम आजाते
पुनः प्रीत की रीत  निभाते
नए भाव स इस धरती पर 
एक नया आकाश  बनाते
धूप का एक छोटा सा टुकड़ा
अंजुली भर बस छाँव बिछाते
नफरत की भीषण आंधी में
अमर प्रेम  का दीप जलाते
 प्रीत पहनते प्रीत  ओढ़ते
प्रीत को एक आधार बनाते
अपमानित हो रही प्रीत को 
ऊँचे शिखरों तक पहुँचाते
प्राण फूंकदे पत्थर में जो
मिलकर ऐसे गीत बनाते
आँहें भरती मंद हवाएं
वन उपवन भी व्यथा सुनाते
तेरे मेरे सब के दुःख में
तरूवर भी जब अश्रु बहाते
भ्रमित होती आस्थाओं में
एक नया विश्वास  जगाते
तुम होते जो साथ हमारे
जाने हम क्या क्या कर जाते
मुक्त करो उन कुंठाओं को
एक नया इतिहास  बनाओ  
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ

भगवान सिंह रावत      (सर्वाधिकार सुरक्षित )

 


 










Sunday, February 19, 2017

जाग उत्तराखंडी जाग

जाग उत्तराखंडी जाग ,जाग जाग और जगा
विपत्ति में पहाड़ है  विजय ध्वज उठा उठा
रंगों का उत्सव नहीं ये तो रक्त फाग है
प्रेम की बंसी पे छिड़ा मौत का ये राग है
शत्रु  तेरे सामने है तूणीर औ तरकश उठा
जाग उत्तराखंडी जाग ,जाग जाग और जगा
विपत्ति में पहाड़ है  विजय ध्वज उठा उठा
अमन ओ चैन हो यहां तू भेद भाव तोड़ दे
सबको सब समझ सकें दिलों को दिल से जोड़ दे
नफरतों की आँधियों में प्यार के दीपक जला
जाग उत्तराखंडी जाग ,जाग जाग और जगा
विपत्ति में पहाड़ है  विजय ध्वज उठा उठा
सपूत है धरा का तू धरा के गीत गए जा
जान की बाजी लगे तो हंस के तू लगाए जा
पुजारी हैं हम प्रेम के सब ये बता बता
जाग उत्तराखंडी जाग ,जाग जाग और जगा
विपत्ति में पहाड़ है  विजय ध्वज उठा उठा


       भगवान् सिंह रावत  (सर्वाधिकार सुरक्षित )