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Wednesday, March 6, 2013

आम आदमी


 आम आदमी

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क्या चीज हो रहा आम आदमी,
नाचीज हो रहा आम आदमी |
           संघर्षों का बोझ पीठ पर,
           ता ऊम्र धो रहा आम आदमी |
थका थका सा हारा हारा ,
जाने कितनी दूर किनारा |
         सुबिधाओं की बाट जोहते ,
         बीत गया ये जीवन सारा |
हाथ लगी जो नाउम्मीदी ,
खुद ही रो रहा आम आदमी | क्या चीज हो.........|
         सुबह शाम बस काम ही काम
         बिना काम के कहाँ है दाम |
हाड़तोड़ मेहनत ही है बस ,
नहीं चैन और ना आराम |
         थकी जहां ये बोझिल पलकें ,
         वहीँ सो रहा आम आदमी | क्या चीज हो.........|
कहीं दीखता नहीं सुधार ,
मंहगाई की सीधी मार |
          वायु यान के यूग मैं भी,
          चींटी सी चाल चले सरकार|
क्या पाया है हमने अबतक .
क्या खो रहा है आम आदमी |  क्या चीज हो.........|
          कभी तो बदले वक्त की नियत ,
          कोई तो हो ऐसी सख्सियत |
नकली चेहरों के शहर में ,
कोई तो होगी असली सूरत |
          सदियों से बंजर धरती पर ,
          स्वप्न बो रहा आम आदमी |
क्या चीज हो रहा आम आदमी,
नाचीज हो रहा आम आदमी |
          संघर्षों का बोझ पीठ पर,
          ता ऊम्र धो रहा आम आदमी |   

                    भगवान सिंह रावत। (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Sunday, March 3, 2013

तुम भी बदल गए तो क्या

तुम भी बदल गए तो क्या 


मौसम बदला दुनिया बदली तुम भी बदल गए तो क्या ,
चकाचौंध के अंधे दौर में आगे निकल गए तो क्या,
मौसम बदला ...........................................|
रंग बदलती इन आँखों मैं पहले जैसा प्यार कहाँ ,
हंसी ठीटोली चंचल कोमल पहले सा मनुहार कहाँ ,
साथ साथ जो देखा था वो सपनो का संसार कहाँ ,
हीरे मोती की चाहत मैं अरमा मचल गए तो क्या |
मौसम बदला ...........................................|
मेरे आदर्शों को लेकर ,मन मैं वो साम्मान कहाँ ,
दिल की बातों से तुम्हारे चेहरे पर मुश्कान कहाँ ,
चाहत को जो समझ सको इतना तुमको ध्यान कहाँ ,
अल्पक तकती मेरी आंखें आंसू निकल गए तो क्या |
मौसम बदला दुनिया बदली तुम भी बदल गए तो क्या ,
चकाचौंध के अंधे दौर में आगे निकल गए तो क्या |
                              
                         भगवान सिंह रावत (स्वरचित)