ऐरा-गैरा बाँट
रहा है चौराहे
पर ज्ञान |
भाई बंधू कहाँ
गए सब ,कहाँ
वो छोटा गाँव
चौराहे का बूढ़ा
बरगद ,और पीपल
की छांव
कहाँ है सूर्योदय
की आभा,कहाँ
है नव प्रभात
दिन का पीछा
कर रही दौड़
-दौड़ कर रात
नफरत घूर -घूर
कर चीखे ,सहमा
है विवेक
नेकी दर- दर
भटक रही ,बदी
का राज्याभिषेख
भले बुरे की
नहीं रही इस
युग मे पहचान
छीन के साधू
का चोगा ओढ़
खड़ा शैतान
सदियों से हम
करते आये खुद
से बुरा सलूक
कितना भारी हो
चला है दुल्हन
का संदूक |
सपनो पर दुःख
की मोहरे है ,पीड़ा देते ख्वाब
|
औषधियों के मोल से क्यों न सस्ती लगे शराब |
दबंगों के इस शहर में अजब अटपटा राग |
अबला लुटे तो दाग दार,जो लूटे बेदाग़ |
भूख ने जो उकसाया ,थोडा सा हुआ गुनाह |
वो क़त्ल करे सरे आम, मिलता नहीं गवाह |
यूँ ही नहीं उठ जाती है हाथों में बन्दूक |
छिपी हुई है इअके पीछे तरह तरह की भूख |
सिंघासन पर बैठ कर हर कोई करे निदान |
काँटों के बीहड़ में जाकर ,धरा रहे सब ज्ञान |

कल 24/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
ReplyDeleteधन्यवाद!
वाह...
ReplyDeleteभले बुरे की नहीं रही इस युग मे पहचान
छीन के साधू का चोगा ओढ़ खड़ा शैतान
सदियों से हम करते आये खुद से बुरा सलूक
कितना भारी हो चला है दुल्हन का संदूक
बहुत सुन्दर रचना..
सादर
अनु