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Thursday, November 3, 2016

याद

अब मुझे  तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
सावन और बदली पास पास है
धुप छाँव में कुछ तो ख़ास है
चांदनी भी  चाँद से शरमाने लगी है
कविताओं के शहर   में
दोहों के नगर में
गीत  बहने लगे है
हर किसी प्रहर में
गीत उजले  उजले हैं
कहानियां गले लगाती हैं
मुश्कुराकर हर ग़ज़ल
किताब में छुप जाती है
मुक्क्तक छणिकायें  भी
नए अर्थ बताने लगी हैं
अब मुझे  तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
फूल खिले हैं भँवरे रहे हैं
अपनी मस्ती में गुनगुना रह हैं
बाग़ का हर पत्ता हर शाख
बेवजह मुश्कुरारहे हैं
बाहर चमन में आचुकी है
हवा के झोंके बता रह हैं
हरियाली भी अपना रंग दिखाती है
बेल भी तने से लिपट लिपट जाती है
पत्तियां आज फूलों का पता बताने लगी है
अब मुझे  तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
मन  को महकाती नूतन  सी भोर है
दूर कहीं जंगल मैं पंछियों का शोर है
वादियों में अजीब सी महक रही है
हरियाली दिखती है  वृक्ष  लहराते हैं
अपने अंदाज़ मैं हवाएं गुनगुनाती हैं
नदिया की लहरें शोर मचाती हैं
तीतर बटेर विचरते हैं
बया प्यार से देखती है
कोयल गीत सुनाती है
एक मुस्कान उभरती है जब
शुखद स्वप्न आते हैं
ख्याबों के क्या कहने
क्या क्या  थमा जाते हैं
उम्मीदें सच को मानाने लगी हैं
अब मुझे  तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
सावन और बदली पास पास है
धुप छाँव में कुछ तो ख़ास है
चांदनी भी  चाँद से शरमाने लगी है




                          भगवान् सिंह रावत       (  सर्वाधिकार   सुरक्षित   ) 

Wednesday, August 3, 2016

तुम्हारी याद

अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
जीवन से  उम्मीद का नाता टूट गया है
कसमों ,वादों का साथ छूट गया है
साँझ के दिए की लौ टिमटिमाने लगी है
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
दूर दूर तक गहरी ख़ामोशी छा  रही है
इठलाती बलखाती निशा
उजाले को चिढ़ाती
संध्या से बतियाती
अन्धकार के आगोश मैं जा रही है
हार जीत का पारम्परिक युद्ध होने लगा है
हौसले, इरादे  दूर खड़े हैं
आस ,उमंग बेसुध पड़े हैं
साहस हताश हो डरकर रोने लगा है
सच  खामोश हो गया है
झूट जाने कहाँ खो गया है
अजीब स्तिथि है ये सबको क्या हो गया है
सब जैसे मुह छिपा रहे हैं
इधर उधर दौड़ते ,भागते
अजीब तरह का अपना व्यवहार दर्शा रहे हैं
दूर छितिज़ से अब लालिमा भी जाने लगी है 
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है ।
कितना रंग बदलेगी ये दुनिया
हर शख्स उसी रास्ते पर निकल जाता है
चार सीढ़ियां चढ़कर पहली सीढ़ी को भूल जाता है
 अपना पुराना  चेहरा हटाकर नया चेहरा लगाता है
गैर खता करे तब भीअपनों का दिल जरूर दुखाता है
क्या नहीं सहा उस बेचारे ने अपने सीने पर                      मगर अक्सर पत्ता पेड़ को ही दोषी बताता है
तुमने तो  अभिलेख गढ़ दिया
किसी और का दोष किसी और के सर मढ़  दिया
वर्तमान ने किस कदर अपने ही इतिहास के
मुह पर तमाचा जड़ दिया ।
अनुभव से सबने नाता तोड़ दिया है
प्रतिभाओं का स्वाभाव बदल गया है
वक्त खुद से आगे निकल गया है
आश्रीवाद ने आडंबरों से खुद को जोड़ लिया है
प्यार के फूल उगाये थे हमने जिंदगी मैं
ये काँटों की फसल कौन उगाकर चला गया 
हमने जरा नजर क्या घुमाई
झमेलों  में थोड़ी देर क्या लगाई
बातों बातों में कोई नफरत थमाकर चला गया
भूले से प्यार भी दिखाओ तो जिंदगी नफरत जताने लगी है
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
बाबाओं के इस देश में झूठ के परिवेश में
हर कोई अपने आप को भगवान बताता है
इंसान भी कस्तूरी की खोज में,भागता चला जाता है
जीते जी कोई  नहीं पूछेगा,मरने पर  रोयेगा पछतायेगा 
कभी बात की नहीं की चाह कर,बाद मैं गरुड़ पुराण बिठायेगा
आदमी अनचाही आस्था को ढ़ोने में लगा है
हित के लिए बने हाथों से,कांटे  बोने लगा है
अबला से किये पापों को,असहाय से मिले श्रापों को
गंगा के तट में डुबकी लगाकर धोने लगा है
पता नहीं क्या क्या कहाँ जोड़ने लगा है
पत्थर को  खुश करने के लिए फूल तोड़ने लगा है
ये कौन सी सुबह है,कौन सा सूरज निकल रहा है
अच्छाई मायूस है,बुराई को बल मिल रहा है
बुराई अच्छाई को अब पाठ पढ़ाने लगी है
अब मुझे तुम्हरी बहुत याद आने लगी है

       भगवान सिंह रावत   ( सर्वाधिकार सुरक्षित ) 




Thursday, May 26, 2016

खामोश

              खामोशी


पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
नदिया के दोनों छोरों सा
चंदा और चकोरों सा
कान्हा और राधा के जैसा
मुरली और ग्वाल के छोरों सा
इस युग में तेरी कद्र नहीं
उस युग का विजय घोष है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
जेठ की तपती  धुप है तू
सावन में मेघ का रूप है तू
बसंती रंग में रंगा रंगा
वसुधा का रूप अनूप है तू
सहज है सम्मानित है
संम्पूर्ण है संतोष है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
प्रेम तो बस एक राज यहां
गूंजती है आवाज यहां
अभिनय तो अच्छा करते हैं
पर सारे सौदे बाज़ यहां
अहसास है अशक्ति है
आलिंगन है आगोश है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।


                             (भगवान सिंह रावत)   सर्वाधिकार सुरक्षित                           

Saturday, May 14, 2016

एक दिन

एक दिन
एक सा हश्र सबका होना है एक दिन
चेहरे पर सादगी भीतर से रोना है एक दिन
जज्बात टूट कर बिखर ना जांयें 
अश्क कही पलकों से उतर न जाएँ
शब्दों का हार पिरोना है एक दिन
बनाते रहो महल, कागज़ के शहर में
रात और दिन सुबह दोपहर में
एक पल मैं बहुत कुछ होना है एक दिन
रेशम और मखमल से गहरा क्यों नाता है
दुनिया के बैभव पर कितना इतराता है
कुदरत के साये मैं सोना है एक दिन
अपने झमेले में उलझा है हर कोई
खुद को उलझाने उलझा है हरकोई
सलीब खुद अपना ढोना है एक दिन
कहाँ तक छिपाएगा अपने उस डर को
कुछ तो समझले कुदरत के दर को
होगा तो वही जो होना है एक दिन
साथ नहीं जायेगा हाथ नहीं आएगा
कितना भी जोर हो पकड़ नहीं पाएगा
ये सच उजागर होना है एक दिन
एक सा हश्र सबका होना है एक दिन
चेहरे पर सादगी भीतर से रोना है एक दिन

( भगवान सिंह रावत )

Monday, September 21, 2015

मैं गीत बनाता जाऊंगा


       मैं गीत बनाता  जाऊंगा











मैं गीत बनाता  जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
काँटों से आहत उपवन में मैं  फूल उगाता  जाऊंगा
सदियों  से खामोश हो पर इकरार कभी तो होगा ही
मौसम  जब जब बदलेंगे इजहार कभी तो होगा ही
फूनों की रुत मैं मिलने का त्यौहार कभी तो होगा ही
बिरहा में जो अश्रु बहे सीने में छुपाता जाऊंगा
मैं गीत बनता जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
प्रीत छुपी मन में  ऐसे सीप मैं जैसे मोती
घोर भयावह अन्धकार मैं दीप की जैसे ज्योति
तरह तरह के फूलों को ये एक माला में  पिरोती
न्योछावर, नतमस्तक हों वो रीत बन|ता जाऊंगा
मैं गीत बनाता  जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
कुदरत ने ने प्रीत को  जन्म दियाकुदरत ही इसकी जाती है
धर्म कर्म सब कुदरत है कुदरत के गीत सुनाती है
भटक रही मानवता को ये सच्ची राह दिखाती है
कुदरत और मानव के मध्य सेतु बनाता जाऊंगा
मैं  गीत बनाता जाऊँगा मन मीत  बनता जाऊँगा
आज नहीं तो कल सही ऐसा भी युग आएगा
पुष्प गाएंगे गीत प्रीत के मनु संगीत सजाएगा
स्वर पंछी के सम्मलित होंगे और चमन मुश्कुरायेगा
बोल उठेंगे पत्थर भी वो आकाश बनाता जाऊँगा
मैं  गीत बनाता जाऊँगा मन मीत  बनता जाऊँगा
काँटों से आहत उपवन में मैं  फूल उगाता  जाऊंगा



                                          भगवान सिंह रावत



Friday, March 13, 2015

मेरे पहाड़ आना


अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।
पूछने पर सरलता से बताया जाता है ,
अथिति देवो भव। जताया जाता है ।
रोटी की कोई कीमत नहीं अंकता ,
बस रोज भूख  को हराया जाता है।
आदत में हर किसी की शामिल है ,
सत्कार में आँखें बिछाना ।
अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।
दूर जहाँ तक नजर जाती है ,
मेहनत की दीवानगी नजर आती है ।
दोपहर की धूप  थोड़ी चुभेगी,
पेड़ की छांव आँचल सी लहराती है ।
घने जंगलों के सैलाब में देखोगे ,
पंछियों का चहकना गुनगुनाना ।
अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।
जज्बातों की कद्र ,भावना का सम्मान है ,
इंसान से भी ऊपर एक और इंसान है ।
कवि की कल्पना साकार दिखेगी ,
प्रकृति का यहां अध्भुत ज्ञान है ।
मैं भी बिखरा  मिलूंगा कहीं पर तुम्हें
पहचान सको तो आँख न चुराना ।
अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।
देवों का गढ़ आस्थाओं का आयाम है ,
तृष्णा क्रोध ईर्ष्या इन सब का विराम है ।
हे मानवता की रक्षक देव शक्ति ,
सत सत मेरा तुम्हे प्रणाम है ।
अर्पण करदे अपना सब कुछ ,
सब संदर्प  संताप मिटाना  ।
अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।


                          भगवान  सिंह रावत


Thursday, January 29, 2015

प्यार तुम्हारा


प्यार तुम्हारा 

तुम साथ मेरे नहीं तो क्या ,
प्यार तुम्हारा आज भी है। 
फूल सी कोमल बाँहों का
वो हार तुम्हारा आज भी  है ।
लुकती छिपती धुप छाँव सी ,
तेरी मेरी प्रीत सही ।
विरह वेदना से तड़पते ,
तेरे मेरे गीत सही ।
दकियानूसी  सोच निभाती,
दुनिया की ये रीत सही ।
मेरे दिल की धड़कन पर ,
अधिकार तुम्हारा आज भी है । 
तुम साथ मेरे नही तो क्या
प्यार तुम्हारा आज भी है। 
मुस्किल के उस दौर में तुमने ,
जीना मुझे सिखाया था ।
दुनिया के हर आडम्बर का ,
चेहरा मुझे दिखाया था ।
नफरत की तेज हवाओं में ,
प्यार का दीप  जलाया था ।
उस दीपक से  जगमगाता,
संसार तुहारा आज भी है ।
 तुम साथ मेरे नही तो क्या  
प्यार तुम्हारा आज भी है।
उम्र ढूंढती तरस रही है 
प्यार तुम्हारा पाने को ।
प्यार का तो अहसास बहुत है ,
मरने को मिट जाने को  
कुछ भी नहीं इस धरा पर ,
यूँ तो दिल लगाने को
मेरे इस दीवानेपन को,
इन्तजार तुम्हारा आज भी है
तुम साथ मेरे नही तो क्या 
प्यार तुम्हारा आज भी है ।  
फूल सी कोमल बाँहों का
वो हार तुम्हारा आज भी  है  

                               भगवान सिंह रावत  दिल्ली 
                                        (स्वरचित)