भागिरथी नदी से मिलती एक छोटी नदी जिस पर थोड़ी थोड़ी दूर के फासले पर तीन चार पन चक्कियां बनी थी ,जमाना पुराना था गांव में बिजली थी नही इस लिए बिजली की चक्कियां भी नही होती थी ।
जिनकी ये चक्कियां होती थी , उनके घर के एक सदस्य को वहां हर समय पिसाई का काम देखना होता था , उस जमाने मे पिसाई के बदले चक्की वाला थोड़ा आटा रख लेता था ,बहुत कम लोग पैसों का लेंन देंन करते थे ।
सरजू ने अबकी बार जब पिसाई का समय आया तो दादा जी को कहा कि वह पनचक्की पर खुद जाना चाहता है ,और काम धाम ज्यादा नही है , तब दादा जी ने उसे बहुत समझाया कि तेरे बस का नहीं है वहां ,रात में डर जाएगा ,पर सरजू ने जिद्द न छोड़ी और अपने आपको निडर साबित करके ही दम लिया ,और अगले दिन तैयार हो गया ,यूँ सरजू कई बार अपने दादा जी के साथ पनचक्की पर गया था ।
जरूरी सामान लेकर सुबह सरजू नदी की तरफ चल पड़ा , इन दिनों गेंहू की फसल के समय पिसाई का काम तेजी से चल रहा था ,सो तीन चार दिन रात में वहां रुकना पड़ जाता था , दो और पन चक्कियां भी थी पर वो भी व्यस्त रहती थी ।
सरजू दिन भर लोगोँ के गेंहू पीसता और बदले में जो पिसाई होती उसे थैले में भर लेता था ,उस दिन उसे पिसाई करते करते शाम के सात बजे गए ,यह वह समय था जब गांव वापस जाने का अर्थ था जंगल का ऊबड़खाबड़ रास्ता पार कर गांव रात नौ बजे पहुंचना अर्थात वह वहीं पर रुक गया , जब पिसाई ही गई तो सुरजु चक्की के उपर गया और पनचक्की की तरफ आने वाले पानी के बहाव को लकड़ी का फट्टा लगा कर बहाव दूसरी तरफ कर दिया हटा , बहाव दूसरी होने से पनचक्की रुक गई ,और सूरज वापस नीचे आकर खाने का जुगाड़ देखने लगा ।
दो तीन बर्तन इस काम के किये वहां पर रखे जाते थे ,उसने अपने लिए आते की दो मोटी रोटियां बनाई और शब्जी बना कर खा पी कर आराम करने लगा ।
कुछ देर लेटने पर उसे नींद आने लगी , तभी उसे लगा कि कोई उसे झकझोर रहा है ,वह हड़बड़ा कर उठ बैठा , उसने देखा तो आसपास कोई नही था , वहम समझ कर वह दोबारा लेटकर सोने की कोशिश करने लगा , आधी नींद में उसे ऐसा लग जैसे किसी ने उसकी चद्दर जोर से खींची हो ,इस बार वह डर गया और उठ कर बैठ गया ,और सोचने लगा कौन होगा , ऐसा तो उसने अपनी बीस बरस के जीवन मे कभी महसूस नहीं किया ।
तभी उसे नदी के पानी का पत्थरों से टकराने के स्वर के बीच एक अजीब तरह का स्वर सुनाई पडा ,जैसे कोई दोतीन औरतें आपस में सुबक सुबक कर रो रही हो ,और फिर छप्प की आवाज हुई जैसे कोई पानी मे छलांग लगाता है , है भगवान यह क्या मुसीबत है , वह उठकर खड़ा हो गया और इधर उधर देखने लगा सात्मने थोड़ी दूर पर भागिरथी नदी थी वह जगह साफ दिक्ख रही थी जहां यह छोटी नदी भागिरथी से मिलती थी ।
सरजू बीस साल का नवयुवक था , अपनी जिज्ञासा को रोक नही पाया और धीरे से किनारे की तरफ से उस ओर जाने लगा , सरजू जब काफी दूर आगया तो सामने उसे भागिरथी नदी दिखाई देने लगी , जहां उसने छप्प की आवाज सुनी थी वहां पर उसे सिवाय नदी की गड़गड़ाहट के सिवाय कुछ नही था , तभी अचानक उसके कानों में किसी महिला की खिल ख़िलाहट सुनाई पड़ी ,वह चौंका , इस समय यहां कोई कैसे हो सकता है , और क्यों होगा , वह किसी अनहोनी की आशंका से घबता गया , उसने इधर उधर देखा ,पर उसे कोई नही दिखाई दिखा , तभी उसे सात्मने की तरफ नदी के इस पार बड़ी चट्टानों पर एक दो नही तीन परछाई जैसी नजर आई , वह स्पष्ट तो आवाज नही सुन पाया मगर ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह तीनों आपस मे बातें कर रही हो । अब सरजू के हाथ पैर ठंडे पड़ गए , लोग भूत प्रेत की बात करते थे , सरजू ने कभी विश्वास नही किया , डरपोक कह कर वह उनका मजाक उड़ाता था , आज वो सब बातें उसे रह रह कर याद आ रही थी जिन्हें वह अक्सर झुठला दिया करता था , अब उसके पैर वहीं जड़वत हो गए थे , वह तीनो साये उससे लगभग पचीस फुट की दूरी पर थे । वह जैसे ही पलट कर भागने को हुआ तभी धड़ाम से एक बडा पेड नीचे गिरा , वह समझ गया , बेटा अब तो आज्ञा हो गई कि वापस जाने की सोचना भी मत ,वह मन मे सोचने लगा ।
क्या बुरा वक्त था जब वह पनचक्की छोड़ कर यहां चला आया , तभी उसे महसूस हुआ कि वह तीनो साये उसके आसपास ही हैं , सरजू डर से उनकी तरफ तो नही देख सकता था , मगर आवाज से स्पष्ट था कि वह तीनो महिकाएँ थी ।
अचानक भय के कारण सरजू ने अपनी आंखों पर हाथ रख कर मुह ढक लिया , जो भी होगा ,और कुछ तो कर नही सकते , कुछ देर और कुछ नही हुआ ,सिर्फ हल्की हल्की आवाज कभी बाएं तरफ से कभी दांयी तरफ से आती रही , वह तीनो उसी रास्ते थी जो वापस जाने का था इस लिए वापस जाने की तो सोच भी नही सकता था ।
तब सरजू को स्पष्ट सुनाई पड़ा ,एक कहने लगी , दीदी मुझे मेरी सास ने आज खाना नही दिया और जंगल मे लकड़ी काटने भूखा भेज दिया , अरे मुझे भी मेरी सास ने आज चुटिया खींच कर पीटा,रोज का यही हाल है , दूसरी बोली , और मुझे भी आज सास ने अंधेरे में ही उठा दिया , रात तब खुली जब मैं गांव से बाहर एक जगह पर बहुत देर तक सोई रही तीसरी तीसरी ने कहा और रोने लगी ,उसे देख दोनों भी रोने लगी , ये सुनकर सरजू भयभीत हो गया , क्या भूतनियों की भी सास होती है वह सोचने लगा , फिर तीनो सुबक सुबक कर रोने लगी । किसी अनहोनी की आशंका से सरजू का दिख बैठ रहा था,एक तो भूतनियाँ ऊपर से उनका रोना , कुछ भयानक ही होने वाला है , हे भगवान अब क्या होगा तीनों बीस फुट की दूरी पर थी , फिर तीनो आपस मे खुपुसाने लगी , और सिर से दुपट्टा निकाल कर आपस मे एक दूसरे को बांधने लगी ।
"दीदी चल ना उस आदमी को भी बांध देते हैं " , उनमें से एक बोली ।
"अरे नही री छोड़ रहने दे" ,दूसरी ने कहा
'हाँ दीदी चलो चलो उसे भी बांध देते हैं , मजा आएगा' तीसरी बोली ,भूत अगर आदमी को बांधेगा तो क्या करेगा इसकी कल्पना मात्र से सरजू का धैर्य जवाब देने लगा ।
अब सरजू मारे डर के कांपने लगा , दो ने बांधने को कहा और एक ने मना किया मतलब बाँधना तय है , मगर मुझे अपने साथ बांधकर कहाँ ले जाएगी ये सोच सोच कर सरजू और ज्यादा भयभीत हो रहा था , उसने फिर दोनों हाथ मुह पर रखे और अपने आपको एक तरह से उनके हवाले छोड़ दिया ।
उन तीनों की आवाज करीब आ रही थी तभी एक बोली "अरे रहने दे इसे ,इसका क्या कसूर है" ।
"तभी दूसरी बोली और हमारा ही क्या कसूर था " दीदी ,में तो इसे बांधूंगी ।
सरजू के हाथ पैर फूल गए बेटा अब तो गए समझो ,ये कौन से कसूर की बात कर रहे हैं , तभी उसने अपने इष्ट देव का ध्यान किया , हे परमेश्वर रक्षा करो , और मन ही मन याद करने लगा
"अरे चल हट रहने दे इसे " पहली बोली और फिर तीनो की लड़ने झगड़ने की आवाज आई , और फिर तीनो की विलाप करने की और सुबकते हुए रोने की आवाज आई , और फिर एक आवाज हुई "छपाक" जैसे उसे पहले सुनाई दी थी पानी मे कूदने की , , और फिर खामोशी छा गई , सरजू ने डरते डरते आंखे खोली , उसे कोई नजर नही आया तो वह जल्दी से पनचक्की की तरफ रास्ते पर दौड़ पड़ा , और अपने इष्ट देव को याद करता रहा , पनचक्की पर आकर उसने चैन की सांस ली ।
वह कुछ देर वहां पर बैठा रहा फिर उठा और थोड़ी दूर पर दूसरी पनचक्की की तरफ गया और वहां पर उसके मालिक को उठाया जो कि उस समय गहरी नींद में सोया था ।
वह एक सफेद दाढ़ी मुछ वाला साठ साल का वृद्ध आदमी था ।
सरजू ने उसे कहा कि वह साथ वाली चक्की वाले जब्बर सिंह का नाती है और आज वह चक्की पर आया था और साथ ही उसने अपने साथ हई कुछ देर पहले की सारी घटना उस आदमी को बताई ।
उस वृद्ध ने उसे कहा कि आराम से अभी सो जाओ , रात बहुत हो गई है ,सुबह बात करेंगे ।
सरजू उसके साथ वहीं पर एक दरी बिछाकर सो गया ।
सुबह रात खुली तो चारों तरफ उजाला हो गया था पनचक्की का काम दस ग्यारह बजे सुरू होताथा , धूप थोड़ी बहुत निकल चुकी थी , उस वृद्ध ने एक गिलास में चाय लेकर सरयू को दी ,और बोला " चाय पीकर फिर वही चलते है जहां तुम रात में गए थे " ।
थोड़ी देर में दोनो उस तरफ चल दिये , आगे आगे सरजू था ।
"-वो रहा चाचा वहीं पर से आवाज आई थी , और ये पेड़ ,अरे ये पेड़ तो रात को गिर गया था , ये फिर स सीधा कैसे हो गया " सरजू ने कहा ।
इस पर वृद्ध हंसने लगा , और बोला " चलो आगे तो चलो " ।
सरजू आगे चलने लगा , एक जगह पर सरजू आकर रुक गया ।
" ये देखो चाचा मैँ यहीं पर इस पत्थर पर बैठा हुआ। था रात को और वो तीनो वहां थोड़ी दूर पर थी " सरजू एक तरफ इशारा करते कहा ।
सरजू ने देखा इस समय वहां कोई नही था , सब शांत , दिन के उजाले में कहीं कुछ नही , और रात के अंधेरे में कितना भयावह , कितना डर , कितनी दहशत ।
एक पत्थर पर बैठ कर वह वृद्ध बोला ," देख बेटा सरजू में बताता हूँ तुम्हे इस के पीछे का सच " ।
वह बताने लगा , " कोई आठ दस साल पहले की बात है , धनौली गांव और आसपास के गांव और हमारे गांव की औरतें इस सामने के जंगल मे लकड़ियां काटने आती हैं ।
" धनौली गांव की ये तीन औरतें अक्सर साथ ही आती जाती थी , मंगला, रेवती और चंद्रा आपस मे सहेलियां थी , तीनों के पति शहर में नौकरी करते थे शादी के कारण कर्ज का बोझ जो हो गया था , घर मे उनकी सास उन पर तरह तरह के अत्याचार करती थी , बेचारी बहुएँ जुल्म सहती रहती थी " ।
" वह आपस मे एक दूसरे को अपनी दुख भारी कहानी बताती थी ,(उस जमाने मे चिठी पतरी चलती थी और महिलाएं तो अधिकतर अनपढ़ ही होती थी ), किसी से चिट्ठी लिखवा कर पति को शिकायत करती , मगर चिट्ठी कभी कभी दस दिन बाद पहुंचती ,कभी पहुंचती ही नही थी ,जवाब की उम्मीद तो क्या करें " ।
" यूँ तो सास बहू झगड़े का ही प्रतीक माना जाता है , हर सास अपनी बहू पर हावी रहना चाहती है पर यहां कुछ ज्यादा ही बड़ी सममस्या थी " ।
" एक दिन तीनो ने आपस मे फैसला किया कि वह अब बर्दास्त नही कर सकती , और भागिरथी में कूद कर अपनी जान दे देंगी " ।
" अपने फैसले को कार्य रूप होकर एक दिन तीनो जंगल आई ,दिन भर बैठी रही , और जब श्याम होने लगी तो तीनों ने अपने आपको बांध लिया ,ताकि उस दौरान कोई अपना फैसला ना बदल सके , और फिर तीनों ने एक साथ छलांग लगा दी " ।
" तीनो पानी मे डूब कर बहने लगी , जब वह तीनो घर नही पहुंची तो घर वालों ने खोज बीन की , बहुत ढूंढा ,मगर उनका कहीं पता ना चला " ।
" फिर एक दिन किसी ने खबर दी कि सिलारी गाँव के नीचे जो भागिरथी का मोड़ है वहां पर तीन युवतियों की लाशें तैर रही हैं , लोग वहां गए उन्हें बाहर खींचा तो उनकी पहचान की गई , ये वही तीन युवतियां थी " ।
" तब धनौली के लोग गए ,और उनका अंतिम संस्कार किया , सिलारी गांव के नीचे भागिरथी के मोड़ पर पानी के बहाव से हर चीज किनारे लग जाती है " ।
" बेटा ये तीनो उन्ही की आत्मा थी जो आज भी यहां भटकती हैं और तुम्हे कल शाम को दिखी थी " ।
उस वृद्ध ने गंगा की तरफ देख कर उन आत्माओं के लिए हाथ जोड़ दिए ,सरजू भी उनकी करुण कहानी सुन विषाद से भर उठा , नियति की इन विडंवना को देख वह स्तब्ध था उसने भी आत्माओं के लिए श्रद्धा से दोनो हाथ जोड़ दिए ।
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भगवान सिंह रावत (दिल्ली)
Wednesday, January 10, 2024
अंधेरा
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