कलम की दुनिया के मित्रों एवं पाठक गणो को मेरा प्रणाम ।
यह एक प्रेम कहानी है जिसमे प्रेम के अनेकों रंग आपको देखने को मिलेंगे ,साथ ही प्रेम के अंकुरित होने से लेकर समर्पण तंक के अहसास का अनुभव भी देखने को मिलेगा । प्रथम बार कोई बड़ी कहानी लिखने लिखने जा रहा हूँ , आपका सहयोग चाहूंगा ,और त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी रहूंगा ।
यह कहानी एक कल्पना मात्र है ,और मनोरंजन के उधेश्य से लिखी गई है पात्रों के नाम , स्थान एवं घटनाएं काल्पनिक हैं , यदि किसी घटना स्थान या नाम का उल्लेख वास्त्विकता के अनुरूप हो तो यह मात्र संयोंग माना जाएगा ।
परंतु कहानी में मानवता के मूल्य , भावनाओं ,और विचारों का चित्रण यथावत किया गया है ,अर्थात मानव जीवन पर आधारित ।
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सुनसान उबड़ खाबड़ रास्ते में केवल दुर्गा के पैरोकी पदचाप ही निस्तब्धता को भंग कर रही थी , भोर की ठंडी बयार चल रही थी छोटे पेड़ पौधे हवा चलने से झुक झुक जाते थे , दोपहर होने में समय काफी था ,मगर वहां आस पास कोई भी हलचल नही दिखाई पड़ रही थी ,सिर पर सामान से लदा बोझा ,कमर से ऊपर कुर्ता, और कमर से नीचे घाघरा ,सिर पर एक चुनरी ,गले मे पारंपरिक हार ,हाथोंमें कोहनी तक भरी चूड़ियां और कड़े ,पैर में पाजेब , राजस्थानी लोहारिन की सम्पूर्ण वेश भूषा में ,उन्नीस वर्षीय दुर्गा का शरीर लोहे का घण चलाते चलाते बहुत शुडौल आकर्षक और मजबूत था ।
छन्न.. छन्न...की व्यवस्थित लयबद्ध आवाज के साथ दुर्गा किले की तरफ बढ़ती चली जा रही थी , हरे भरे वन में चारों तरफ सन्नटा छाया था , कभी कभी बीच बीच में पक्षियों का स्वर उभर जाता था दुर्गा एक लोहार की बेटी थी , दशरथ की बेटी , मां गोमती और एक छोटा भाई छगन , यही चार प्राणी थे उस परिवार में , गाड़िया लोहार , राजपूती सेना के लिए युद्ध के औजार बनाते थे , तलवार , कटार ,ढाल, बरछी आदि , किले के बाहर चौकी से एक सिपाही लोहारो की बस्ती में आता और उनका काम और कुशलता देख कर , कुछ हथियारों का अनुबंध कर उन्हें पेशगी दे जाता था , दुर्गा का परिवार भी उनमें से एक था । दुर्गा कई बार इस सुनसान चौकी पर आती , और उस चौकी के सरदार को हथियार गिनवाती थी ,चौकी का सरदार सुमेर सिंह हृष्ट पुष्ट नौजवान था , चेहरे पर तेज , हर समय सैनिक की पोशाक में दिखता था ।
दुर्गा किले की चौकी पर पहुंची तो अचानक उसे एक कड़क आवाज सुनाई दी , "ऐ छोरी रुक ,कहां चली जा रही है " ? दुर्गा के कदम एका यक रुक गए , लंबा तगड़ा शरीर , लंबी काली मूछें , हाथ मे बरछी ,कमर में कटार , द्वार पाल तेजी से उसकी तरफ बढ़ा ,
" दुर्गा हूँ सरकार " ,वह बोली
" कौन दुर्गा " ?
"अरे नए आये हो क्या साहिब ? मैं तो कितनी ही बार आई हूँ यहाँ ,लोहार दशरथ की बेटी हूँ , वो साहिब नहीं है क्या , सुमेर .....हुकम " ,
तभी उनका वार्तालाप सुन किवाड़ खुला और सुमेर सिंह बाहर आया ,
देखते ही दुर्गा बोली " वो देखो आगये हुकम " ,
"खम्मा खणी हुकम " , " ये देखो ये नया द्वारपाल आया है क्या , मुझे रोक रहा है , इसे मालूम नही कि " .....,,दुर्गा सुमेर सिंह को देखते बोली ।
दुर्गा आगे कुछ ना बोल पाई , कुछ देर खामोश रहकर सुमेर थोड़ा मुस्कराता बोला , " ये नए द्वार पाल है , इनको पूछने का अधिकार है " , तब सुमेर सिंह बोला "दीवान सिंह इनका बोझ उत्तरवाओ और औजार चेक करो " ।
दुर्गा ने सिर पर रखा बोझा उतरवाया और औजार गिनवाए , कुछ तलवारें कुछ ढाल , सब चेक कर दीवान सिंह ने सुमेर सिंह को बताया ।
"ठीक है दुर्गा " सुमेर सिंह बोला
" हुकम देखो ना ये नया द्वारपाल कैसा अकड़ू है
बात भी नही सुनता ,हुँ " .....। दुर्गा मुह बिगाड़ते बोली । इस पर सुमेर सिंह मुस्कुराया और बोला , " दुर्गा ये द्वारपाल है इसका काम है ,सतर्क रहना , और हर किसी को एक नजर से देखना , कोई दुश्मन भी तो हो सकता है " ।
" अरे तो क्या मैं इसे दुश्मन लागूं हूँ हुकम " ?
सुमेर कुछ ना बोल कर खामोश हो जाता है , और दुर्गा को ताकता रहता है , दुर्गा उसकी खामोशी से सहम जाती है ," ठीक है हुकम मैं चालूं " ।
और दुर्गा उल्टे पैर लौट जाती है , सुमेर सिंह उसे जाते हुए देखता है , " पगली , चंचल , चुलबुली " , वह मन ही मन मे बुदबुदाया और सुमेर सिंह के चेहरे पर फिर एक मुश्कान खिल जाती है ।सुमेर सिंह एक पांव दीवार पर टिका हथेली ठोड़ी पर लगा देर तक उस रास्ते को निहारता है जिस रास्ते दुर्गा जा रही है , कुछ देर बाद दुर्गा पकडण्डी से जाते हुए ओझल हो जाती है । तब वह अपनी नजर पश्चिम की ओर केंद्रित करता है ।
सुमेर सिंह की तेज और पैनी नजर , चप्पे चप्पे पर एक एक पेड़ पौधे को ,चट्टानों को ,टीलों को खंगालती , शत्रु की टोह लेने में माहिर थी । शत्रु का उस नजर से बच पाना नामुमकिन था ।
दूर दूर तक ऊंची पहाड़ियां और घने जंगलों के सैलाब से लदी हुई घाटियां ,सौंदर्य की प्रातीक ,
मगर हाल के कुछ दिनों में इन घाटियों में शत्रु की गतिविधियां कुछ ज्यादा बढ़ने लगी थी , पूरे राज्य में पश्चिम की तरफ साँकर गढ़ अपने आप मे दुश्मनों से लोहा लेने में पूरी तरह सक्षम था ,पांच हजार सैनिकों का जमावड़ा और एक से एक बहादुर सैनिकों का समूह ,शत्रु के लिए इस गढ़ के किले को भेदना नामुमकिन था , सुमेर सिंह के जिम्मे दो सौ सैनिकों की एक टुकडी थी , सुमेर सिंह अत्यंत सतर्कता तो बरतता ही था , साथ ही युद्ध कौशल और सच्चा देश भक्त भी था और पैनी नजर रखने में भी माहिर था ये देशभक्ति उसे विरासत में मिली थी ,उसके पिता उदय वीर सिंह भी इसी सेना के सरदार थे ,शत्रु के साथ उन्होंने कई युद्ध लड़े और शत्रु को भयंकर क्षति पहुंचाई , और एक युद्धमे वह लड़ते लड़ते वीर गति को प्राप्त हुए ,सुमेर सिंह भी अत्यन्त साहसी और वीर योद्धा था , हर वक्त , हर खतरे से निपटने में सक्षम , इसी लिए उसे इस किले की राजपूती सैनिक छाँवनी का सरदार नियुक्त किया गया था ।
सुमेर सिंह की विधवा माँ भंवरी देवी अपनी छोटी बेटी दीपिका के साथ अपने गांव कठौली में रहती है
सुमेर सिंह में बचपन से ही उसके पिता के बहादुरी और देश भक्ति के लक्षण मौजूद थे , भंवरी देवी ने उन गुणों को और तरासने का काम किया , औऱ सुमेर सिंह को अपने पिता के जैसा बहादुर ,साहसी और कर्तव्यनिष्ठ बनाया ।
जारी है..........। तेरे इश्क़ में (भाग 2)

