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Friday, December 9, 2022

अच्छाई

 


अपना काम निपटा कर मैं सड़क के किनारे बैटरी रिक्सा का इंतजार कर रहा था । सब सवारियों से लदे हुए निकले जा रहे थे,कोई खाली नही था । तभी दूर से एक बैटरी रिक्सा मुझे दिखा,मैंने हाथ से रुकने का संकेत  किया ,रिक्सा झट रुक गया ।उसमे दो सीट खाली थी । और मैंने देखा उसे एक चौबीस पच्चीस साल की लड़की चला रही थी ।ये देख कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ,ऐसा मैंने इस इलाके में अभी तक नही देखा था । खैर मैं सीट पर बैठ गया ।,और उस लड़की के विषय मे सोचने लगा ।मुझे बड़ी खुशी हुई ,एक महिला रिक्शा चला रही है , बड़ी हिम्मत का काम है । भले ही उसकी कोई मजबूरी रही होगी,मगर यह महिला को बराबरी का दर्जा मिलने की दिशा में एक नूतन प्रयास था । सभाएँ करने से, समितियां बनाने से , और अध्यक्ष ,सेकेट्री,या कोई पद हासिल करने से,और मीडिया में चर्चा में आने से , बेहतर कदम था यह , ऐसे अनोखे प्रयोग अगर चल निकले तो निसंदेह हमारे समाज की सोच उत्कृष्ट होगी और महिलाओं के प्रति हेय की दृष्टि रखने वालों के मुह पर तमाचे के समान होगा । उस महिला के प्रति मन मे उदारता के भाव उत्पन्न हुए ।  ऐसा प्रयास या ऐसी स्तिथि जहां भी देखता था मन एक सुखद अनुभूति से भर उठता था । तभी अचानक रिक्सा रुका,मेरी तंद्रा टूटी रिक्सा मेरे स्टैंड पर रुक गया था  ।
" चाचा जी  आपका स्टैंड आ गया है ,यहीं उतरना था ना आपको ' ? वह बोली
"अरे.... हाँ हाँ  ख्याल ही नही आया " ,और मैं उतरने लगा । किराया दस रुपये होता है, पर मुझे पता नही क्या सुझा मैंने उस लड़की से कहा  " देखो बेटी तुम मेरी बेटी जैसी हो ,बुरा मत मानना ये तुम पचास रुपये रखलो , मुझे तुम्हे ऐसा काम करते देख बड़ी खुशी हुई है ,किस बहादुरी और हिम्मत से तुमने ये काम करने का निश्चय किया है,ये तारीफ के काबिल है ,इसे अपना पारितोषिक समझो ,आज हमारे समाज को तुम्हारे जैसे बदलाव की जरूरत है " , और मैं वहां से चलने लगा ,वह मेरे वाक्य सुन कर हतप्रभ रह गई । वह बोली चाचा एक मिनट ,वह मेरे पास आई और झट मेरे पैर छू लिये । मै नही जानता उसने मेरी बातों को कितना समझा , परन्तु  उसकी आँखों मे एक चमक थी और कृतज्ञता के भाव थे । मैं वापस घर लौट आया ।  मैं  अक्सर बैटरी रिक्शा में आता जाता रहता था । इस बात को कई दिन बीत गए , एक दिन घर से निकल कर गया तो मेट्रो स्टेशन पर  उतर कर मैंने रिक्सा वाले को पैसे देने के लिए उसे पैसे देने चाहे पर मेरे पास सौ का नोट था ,वह बोला  " खुले नहीं है चाचा , खुले दो । मेरे पास खुले नहीं है " , " जाकर किसी रिक्से वाले से मांग लो खुले " , मैंने कहा । इस बात पर वह अकड़ बैठा , "मैं क्यों जाऊं ,आप जाओ " वह बोला । भरे बाजार में उससे बहस करना मैंने ठीक नही समझा ,और इधर उधर देखने लगा  किसी रिक्से वाले को , चौक के पास और रिक्से थे शायद उनके पास हो ये सोचकर में उस तरफ बढ़ा । तभी पीछे से आवाज आई रुको चाचा जी......। कौन....हो ,मैंने पूछा,एक बीस बाइस साल का युवक खड़ा था , मैं कुछ कहता इससे पहले वो युवक बोला "आपको कुछ करने की जरूरत नही है ,मैंने पैसे उसे दे दिए है "। पर आपने क्यों....,,,।
" आपको शायद ध्यान नही है ,उस दिन जब आपने उस लड़की को पचास का नोट ढिया था तो मैं रिक्से मेही बैठा था ,और आपकी बाते सुन रहा था , आपके उच्च विचारों से मैं बहुत प्रभावित हुआ था , एक अच्छाई का काम मुझे भी करने दीजिए प्लीज "
मैं  उससे जो कहता ,उसने पहले ही उसने प्लीज कह कर बात का अंत कर दिया , " ओह....थैंक्यू अगर ऐसी बात है तो  ठीक है " , मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर थपथपाया , " खुश रहो , इस ज्योति कोअपने अंदर जलाए रखना , इसे बुझने मत देना "। युवक  मुस्कराया और हाथ जोड़कर चला गया । में आश्चर्य चकित था ,उस लड़की का चेहरा मेरे मष्तिस्क में घूम गया । मुझे ऐसा लगा जैसे वह लड़की ही आकर ये काम कर गई हो , सच कहा है किसीने जैसा बोओगे वैसा काटोगे ,अच्छाई ,नेकी, भलाई हमेशा किसी ना किसी रूप में लौट कर आ ही जाती है , हमे कभी कभी अपने सीमित दायरे से ऊपर उठ कर भी चलना चाहिए ।
                           भगवान सिंह रावत ( दिल्ली )

Thursday, December 1, 2022

वक्त के कंधों पर

 वक्त के कंधों पर ,ठहरी है जिंदगी ।

सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।

माया और वैभव में उलझ कर रह गई ,

शिक्षा संस्कारों की दीवारें ढह गई ,

भोग और रोग के सैलाब में लिपटी,

लगती कितनी सुनहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

वैभव की चाहत में चल पड़ी गाँव से ,

ऊंचाइयां छोड़ गई खुद अपने पांव से ,

उम्मीद के साये में सपनों को बुनती,

बेगानों जैसे शहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

उधेड़ती है सपने बार बार बुनती हैं ,

अपने पराये की आहट नही सुनती है ,

सिमट के रह गई अपने ही आस पास,

लगता है जैसे बहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

थोड़ा सा पाया और कितना खोया है,

स्वार्थ की धरती पर तृष्णा को बोया है ,

ता उम्र जिंदगी कुछ और बनी रही ,

जाने कहाँ है जो लहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।

                           भगवान सिंह रावत (दिल्ली)