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Monday, December 29, 2014

आदमी

                                                                                  आदमी

इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी
सच्चे दिल से पूछके देखो ,
आँख चुराता है आदमी
बचपन में बडों कi डर ,
अव्वल आने की फिकर ,
कहना सुनना दूर की बात ,
कम क्यूं आये हैं नंबर
क्या कहे क्या कहे ,
बस हकलाता है आदमी
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
उम्र बढ़ी तो जागे सपने ,
कुछ उम्मीदें लगी पनपने ,
तभी  कहर कुछ ऐसा बरपा ,
लगे मानाने मेरे अपने
फेरों के बंधन में जाने ,
कब बंध  जाता है आदमी ,
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
कब बीता ये प्यारा बचपन
जाने कब आगई   जवानी ,
दरिया पर जो बाँध लगा तो।
उम्मीदों पर फिर गया पानी
दिखता सबको जिन्दा है पर
खुद मर जाता है आदमी ,
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
जरूरतों के बोझ तले
समस्याओं  से घिरा हुआ  ,
मन की बात समझे कोई
और  कहे शरफिरा हुआ
अपने सा  मिल जाये कहीं तो ,
रो रो जाता है आदमी ।  
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
            भगवान  सिंह रावत (स्वरचित)

Thursday, September 18, 2014

जिंदगी ।

             जिंदगी

चेहरो पर मुखौटे हैं इनको क्या देखें ,
भीतर कुछ और ही होती  जिंदगी
रात के अंधेरों में जागती रहती है ,
पल भर भी नहीं सोती है जिंदगी
दुनिआ के मेले में  झंझट झमेले  में,
बिलकुल अकेली ही होती है जिंदगी
भीतर के जख्मो को कब किसने बांटा है ,
खुद अपना सलीब ढोती है जिंदगी
बैभव समेटने को उम्र कम पड़ती है ,
बदले में  कितना कुछ खोती है जिंदगी |
जीवन के उपवन मैं माया के  बंधन   में,
 रिश्तों के मोती पिरोती है जिंदगी  |
खुद के गुनाहों को कुदरत के घावों को ,
आस्था की गंगा मे धोती है जिंदगी |
खुद में  जब झाँका और दोषी पाया ,
करुणामय  होकर  रोती  है जिंदगी |
चेहरे बदलते हैं इन पर मत जाओ ,
भीतर कुछ और ही होती  जिंदगी

            भगवान सिंह  रावत  (स्वरचित)


Sunday, June 8, 2014

दौड़ती भागती है जिन्दगी

 दौड़ती भागती है जिन्दगी
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कितना दौड़ती भागती है जिन्दगी
नींद मैं भी देखो जागती है जिन्दगी ।
जन्म क्या लिया गुनाह करदिया
हर कदम पे सिला मांगती है जिंदगी ।
सपने बुनती है तोडती मरोड़ती है
अपने अनुभव से फिर उसे जोडती है ।
कुलांचे भरती है सब कुछ रौन्ध्ती है
पीछे नहीं देखती बस आगे ही दौड़ती है ।
नियमों के बंधन को ताक पर रख कर
खुद को कुछ अलाग ही आंकती है जिंदगी । कितना दौड़ती.........।
छोटी सी बात पर रूठ रूठ जाती है
अपनों को गैरों को सबको सताती है ।
सच के  उजाले को खुद मैं छुपाकर
झूठ के लबादे मैं खुद छुप जाती है ।
बदलते चेहरों की दुनिया मैं आकर
झूठ और फरेब को हांकती है जिंदगी । कितना दौड़ती..............।
कितना दुःख होता है जब अपनों को खोती है
करुणा के साये मैं खुद को पिरोती है ।
रोती है बिलखती हो लिपट लिपट जाती है
बैर भाव मन मुटाव आंसुओं से धोती है ।
दिल से लगाती हैै तब हर किसी चीज को
कुदरत के मूल्यों मैं जब झांकती है जिन्दगी ।
कितना दौड़ती भागती है जिन्दगी
नींद मैं भी देखो जागती है जिन्दगी ।
जन्म क्या लिया गुनाह कर दिया
हर कदम पे सिला मांगती है जिन्दगी ।

Thursday, March 27, 2014

गुमराह सी जिंदगी

       
   

भूलती भटकती गुमराह सी जिंदगी
क्यूँ नहीं हो जाती एक राह  सी जिंदगी ।
             जीवन के मूल्यों को मिटाती बनाती है
             नियमों के बाँध भी खुद ही लगाती है ।
             गैरों का दखल मंजूर नहीं होता
             छोटी सी  बात पर रूठ रूठ जाती है ।
अपनों से गैरों से लड़ते झगड़ते
लगती है जैसे गुनाह सी जिंदगी ।  भूलती भटकती  ……।
             बड़े बड़े सपने पर जीवन तो बौना है
             नियति के हाथों में हर कोई खिलौना है ।
             वसुधा के साये में भ्रमित है हर कोई
             यहीं से पाया है यहीं पर खोना है ।
उम्र नप जााती है कुछ ढूँढ़ते विचरते
लगता है जैसे चरवाह सी जिंदगी ।   भूलती भटकती  ……।
              अन्न तो बिखरा है खेतों खलियानों में
              फूलों के मेले  भी लगते बागानों में ।
              सरिता का पावन जल सबके लिए है
              फर्क नहीं होता उसके पैमानों मैं।
सबकुछ है फिर भी कुछ रीता सा लगता है
लगता है जैसे एक चाह  सी जिंदगी।   भूलती भटकती  ……।
              कभी कभी रोना है कभी मुस्कुराना है
              रूठना है कभी और कभी मनाना  है ।
              अंदर कि पीड़ा तो खुद को ही सहनी  है
              अपना सलीब भी खुद ही उठाना है ।
हार कर जाना है कुदरत के साये मैं ।
लगता है जैसे पनाह सी जिंदगी ।
भूलती भटकती गुमराह सी जिंदगी
क्यूँ नहीं हो जाती एक राह  सी जिंदगी ।

                                             भगवान सिंह रावत