तुम्हारी कमी अब
बहुत खलने लगी
है ।
अंधेरों के डर
से
मेरी नजर से
रौशनी भी अब
रेत की तरह
फिसलने लगी है
।
उम्र की दोपहर
चिलचिलाती धूप
से तिलमिलाकर दम तोड़ने
लगी है ।
लोगों के परिहास
से
टूटते विस्वास से
उम्मीदें मायूसी मैं बदलने
लगी है ।
समय का सारथी
बेरहमी से सबको
कुचलता हुआ रथ
को हांक रहा
है ।
रंग बदलता आसमान
निशाचर की
मुस्कान
अन्धेरा सब कुछ
निगलने को धरती
पर झाँक रहा
है ।
जिंदगी अब बैराग
की लों में
जलने लगी है ।
तुम्हारी कमी अब
बहुत खलने लगी
है
विश्वास की कोख
से व्यभिचार जन्म
होने लगा
है ।
बाबाओं के देश
मैं
झूठ और ढोंग
के परिवेश में
मनुष्य अनचाही आस्थाओं को
ढोने लगा है
।
अनुभव से आश्रिवाद
से जैसे रूठ
गया है
विवेक शर्मसार है
व्याप्त अहंकार है
प्रेरणा से कर्म
का साथ छूट
गया है ।
हर चौराहे पर भीड़
जुटाकर हर कोई
प्रवचन सुनाता है
सच की चादर मोड़कर
झूठ का लबादा
ओढ़कर
अपने आप को को
भगवान् बताता है ।
अन्न की जगह
अब आग की
फसल ज्यादा खिलने
लगी है
वम्नस्य और
अलगाव
मद और क्रोध
के गिरते भाव
नफरत तो जैसे
मुफ्त मैं मिलने
लगी है ।
प्रतिभाएं भी अब
स्वभाव बदलने लगी है
।
तुम्हारी कमी अब
बहुत खलने लगी
है
अहसासों के सैलाब
मैं एक
उम्मीद थी तुम्हे
पाने की ।
एक बार तुम्हे
छूने की
तुम्हारे मुस्कुराने की
और फिर वक्त
के वहीँ पर
थम जाने की
।
और थम हुआ
वक्त खुद को
युगों में बदल
डाले
अजंता की हो
जैसे मूरत
प्रतिमाओं जैसी हो
सूरत
और इतिहास हमें अपने
आप में छुपाले
।
वसुंधरा प्रेम के गीत
गाती गुनगुनाती रहे
पंछी चहकते रहें
फूल यूं ही
महकते रहें
सरिता की लहरें
यूंही बलखाती रहें
।
वक्त की वो सुबह
देखने को तबियत
मचलने लगी है
तुम्हारी कमी अब
बहुत खलने लगी
है।
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है ।
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है ।
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
