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Friday, October 7, 2011

भ्रष्ट तंत्र


                भ्रष्ट तंत्र

राह से तिमिर हटा
                    ज्ञान दीप जल पड़े |
भ्रष्ट तंत्र नष्ट हेतु
                    लक्ष पग निकल पड़े |
ईमान बेच कर बने
                    प्रासाद ध्वस्त कर चलो |
कठोर कर्म से बने
                    पथ प्रसस्त कर चलो |
व्याधियां विकार मन से
                     अब निरस्त कर चलो |
वाहिनी बना बना
                     असंख्य जन मचल पड़े |
 राह से तिमिर हटा
                    ज्ञान दीप जल पड़े |

समाज से ये राजतंत्र
                     दूर हो नष्ट हो |
नीतियों का रीतियों का
                      आईना स्पष्ट हो |
दिखाने और बताने में
                       अंतर स्पष्ट हो |
तंत्र में बदलाव हो
                       तैयार हैं हम सब खड़े |
                        
    राह से तिमिर हटा
                           ज्ञान दीप जल पड़े |

बहुत धीर धर चुके
                      जवाब हमे चाहिए |
मंथर - मंथर नहीं
                      प्रभाव हमें चाहिए |
विश्वास हो लगन हो
                      ऐसा भाव हमें चाहिए |
कर्म बोझ न बने
                     कर्म से जो खुद लड़ें |
                      
   राह से तिमिर हटा
                        ज्ञान दीप जल पड़े |

संकुचित समाज को
                        ऐसा एक यन्त्र दो |
जन जन हो विकसित
                        कोई ऐसा मंत्र दो |
मिसाल विश्व में बने
                        ऐसा गणतंत्र दो |
साक्ष्य हो इतिहास भी
                         ऐसा कुछ बन पड़े |
राह से तिमिर हटा
                    ज्ञान दीप जल पड़े |
भ्रष्ट तंत्र नष्ट हेतु
                    लक्ष पग निकल पड़े |

               भगवान सिंह रावत  (स्वरचित)

Saturday, October 1, 2011

ख़ामोशी

                 ख़ामोशी 
पानी की तरह शीतल है तू 
हवावों  सा मदहोश है तू 
वर्षों से जिसे ठुकराया  गया 
ये प्यार मेरे खामोश है तू 
नदिया के दोनों छोरों सा 
चंदा और चकोरों सा 
कान्हा और राधा के जैसा 
मुरली और ग्वाल के छोरों सा 
इस युग मैं तेरी कद्र नहीं 
उस युग का विजय घोष है तू   पानी की तरह .......
जेष्ठ की तपती धुप है तू 
सावन में मेघ का रूप है तू 
बसंती रंग मैं रंगा रंगा 
उज्वल वसुधा का रूप है तू 
सहज है सम्पूर्ण  है तू 
सम्मानित है संतोष है तू        पानी की तरह .......   
प्रेम तो है एक राज यहाँ 
गूंजती है आवाज यहाँ 
अभिनय तो सारे करते हैं 
पर सारे  सौदेबाज यहाँ
अहसास है अशक्ति है 
आलिंगन है आगोश है तू        पानी की तरह .......  

ख़ामोशी

            ख़ामोशी 
पानी की तरह शीतल है तू 
हवावों  सा मदहोश है तू 
वर्षों से जिसे ठुकराया  गया 
ये प्यार मेरे खामोश है तू 
नदिया के दोनों छोरों सा 
चंदा और चकोरों सा 
कान्हा और राधा के जैसा 
मुरली और ग्वाल के छोरों सा 
इस युग मैं तेरी कद्र नहीं 
उस युग का विजय घोष है तू   पानी की तरह......

जेष्ठ की तपती धूप  है तू 
सावन में मेघ का रूप है तू 
बसंती रंग मैं रंगा रंगा 
उज्वल वसुधा का रूप है तू 
सहज है सम्पूर्ण  है तू 
सम्मानित है संतोष है तू      पानी की तरह.......
प्रेम तो है एक राज यहाँ 
गूंजती है आवाज यहाँ 
अभिनय तो सारे करते हैं 
पर सारे  सौदेबाज यहाँ
अहसास है आशक्ति है 
आलिंगन है आगोश है तू      पानी की तरह.......