Sunday, January 30, 2011
Monday, January 24, 2011
टिहरी की झील पर एक कविता

तैरती परछाइयां
अब केवल हम हैं और ये तन्हाइयां
कुछ दिन पहले यहाँ कुछ सपने थे
कुछ पराये थे पर कुछ अपने थे
सांसें थी आहे थी उज्वल निगाहें थी
बाधाओं को चीरती गंतव्य भरी राहें थी
बचपन था जवानी थी अदाएं दीवानी थी
गलियों मैं विचरती अगणित कहानी थी
उमंग और उन्माद था हर्ष और उल्लाश था
कर्म था जीवन था दर्द और अहसास था
जिनगी हंसती थी बजती थी शहनाइयाँ
उभरती इस झील मैं तैरती परछाइयां
वक्त जैसे थम गया हर सक्श जैसे जम्म गया
झील के सौंदर्य मैं हर कोई अब राम गया
बंद दरिया के किनारे अब सभी ख़ामोश हैं
और मौजों के वो धारे बस झील का आगोश है
याद ही बस रह गयी है सब कहानी बह गयी है
दूर तक जाती निगाहें अब जबानी रह गयी है
भोर और दोपहर आई और फिर दिन ढल गया
हर तरफ विकाश का एक पहिया चल गया
भूल बैठे हम हमारे पूर्वजों की साख को
याद रखने को है बस अब झील की सच्चाइयां
उभरती इस झील मैं तैरती परछाइयां
अब केवल हम हैं और ये तन्हाइयां
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
Subscribe to:
Comments (Atom)
