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Monday, January 24, 2011

टिहरी की झील पर एक कविता

तैरती परछाइयां  

उभरती इस झील
में तैरती  परछाइयां 
अब केवल हम हैं और ये  तन्हाइयां 
              कुछ  दिन पहले यहाँ  कुछ सपने थे 
              कुछ पराये थे पर  कुछ अपने थे 
सांसें थी आहे थी उज्वल निगाहें थी 
बाधाओं को चीरती गंतव्य भरी राहें थी 
                बचपन था जवानी थी अदाएं दीवानी थी 
                गलियों मैं विचरती अगणित कहानी थी 
उमंग और उन्माद था हर्ष और उल्लाश था 
कर्म था जीवन था  दर्द और अहसास था 
                 जिनगी हंसती थी बजती थी शहनाइयाँ 
                 उभरती इस झील मैं तैरती परछाइयां 
वक्त जैसे थम गया हर  सक्श जैसे जम्म गया 
झील के सौंदर्य मैं हर कोई अब राम गया 
                    बंद दरिया के किनारे अब सभी ख़ामोश हैं
                   और  मौजों के वो धारे बस झील का आगोश है 
याद ही बस रह गयी है सब कहानी बह गयी है 
दूर तक जाती निगाहें अब जबानी रह गयी है 
                   भोर और दोपहर आई और फिर दिन ढल गया 
                      हर तरफ विकाश का एक पहिया चल गया 
भूल बैठे हम हमारे पूर्वजों की साख को 
याद रखने को है बस अब झील की  सच्चाइयां 
                       उभरती इस झील मैं तैरती  परछाइयां 
                       अब केवल हम हैं और ये  तन्हाइयां

                              भगवान सिंह रावत (स्वरचित)