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Friday, December 30, 2011

मैं तो गीत बनाता हूँ


जीवन की राहों पर चलते 
जब  दुविधा से घिर जाता हूँ
 कलम से लिख कर कागज पर 
अपने भाव जताता हूँ 
मैं तो गीत बनाता हूँ |   मैं तो गीत बनाता हूँ
 नीरसता छा जाती है 
जब कुंठाएं घिर आती है 
नई नई बाधाएँ आकर 
अपना पता बताती है 
वक्त के हाथों छीन के कुछ पल 
अपने लिए बचाता  हूँ |  मैं तो गीत बनाता हूँ
कहीं शोक संताप  कहीं 
छाया पश्चाताप कहीं 
कहीं वेदना उमड़  रही है 
दुख और दर्द विलाप कहीं 
करुण काव्य लिखने  से पहले 
खुद को बहुत रुलाता हूँ |  मैं तो गीत बनाता हूँ
ये वैमनस्य और ये अलगाव 
ताजे हों जब बासी घाव 
गर्म मिजाज के मौसम में 
मद और क्रोध का हो टकराव 
नफरत की भीषण आंधी में 
प्रेम के दीप जलाता हूं|  मैं तो गीत बनाता हूँ
जीने का दम भरते लोग 
सच से कितना डरते लोग 
जीने के लिए दौड़ लगाते 
फिर भी कितने मरते लोग 
थककर चूर न हो जाऊं 
इतनी ही दौड़ लगता हूं |   मैं तो गीत बनाता हूँ 
प्रेम का जो वरदान मिले 
पत्थर के इन्सान मिले 
जुड़े दिलों को तोड़ तोड़ दे 
ऐसे भी शैतान मिले 
काँटों के बीहड़ में जाकर 
मैं तो फूल उगाता हूं 
मैं तो गीत बनाता हूँ   मैं तो गीत बनाता हूँ 

Friday, December 2, 2011

उत्तराखंड बनने से पहले लिखी गई एक कविता


                 

उत्तराखंड बनने से पहले लिखी गई कविता

बिछोह का दर्द 
__________

ऐमेरे प्राणों से प्यारे पर्वतीय प्रदेश 
तेरे पथ के एक शिला  खंड पर बैठा आज तुझ से
बिछड़ने का दर्द महसूस कर रहा हूँ |
लहलहाती शीतल हवांयें
ऊँची पर्वत श्रंखलायें 
इंद्र धनुषी रंग और कलरव करती सरिताएं |
उड़ते पंछियों के स्वर 
बहते झरने इधर उधर 
दूर घने  जंगलों का सैलाब 
जहाँ तक न पहुंचे नजर |
हम सच मुच अभागे हैं
जो तेरी संपदा को छोड़कर 
तुझ से मुंह मोड़कर 
जारहे हैं दूर शहरों मैं 
दिखावे का लावादा ओढ़कर |
जी भरकर रोलेने को मन करता है 
गला भर आया है 
आंसू हैं कि थमते ही नहीं |
मन करता है तेरी जमीन पर लोटपोट होजाऊँ 
तुझे गले लगाऊं 
ताकि लोग मुझे  तुझसे अलग ना कर सकें |
वो तो हमारे पहाड़ मैं बिछड़ने से पहले रोने का रिवाज है ;
वर्ना लोग मुझे देखकर हँसते ,फिकरे कसते ,
मेरे साथ चलने वाले लोग जाने किस मिटटी के बने हैं ,
कितना उल्लास है इनमे शहर जाने का 
किल्लत का जीवन जीकर खाने कमाने का |
अगर तू माँ है तो तेरे आँचल  में मेरे लिए   दूध  नहीं  है 
वक्त कि तेज  रफ़्तार ने  तेरे आँचल  को काट काट  कर छलनी कर दिया है |
अगर  तू पिता   है तो तेरे पास  मुझे खिलने   को पर्याप्त  अन्न नहीं है 
मौसम कि हर नई फसल  पर तेरे हाथों क़ी रोटी का आकार  छोटा हो जाता है |
बहुत बड़ी  विडंबना  है यह कि एक पुत्र को पता चले कि  पिता के पास उसे देने को कुछ  नहीं है |
 मुझे याद  है कुछ दशक पहले के वो वृद्ध चेहरे ,
जो स्वतंत्रता के नाम पर खिल उठे थे
लगा था जैसे हमें एक आसमान मिलगया हो 
आजादी नहीं जैसे भागवान  मिलगया हो 
मगर वो चेहरे मुस्कुराये  भर थे कि हंसी मायूसी में बदल गई 
उगती सुबह हाथ लगी थी सांझ ढल गई |
विकाश के नाम पर वोटों और वायदों कि राजनीती ने आदमी को अँधा बना  दिया 
लोगों ने काम काज छोड़ राजनीती को धंदा बना दिया ,
आदमी समाज कल्याण को छोड़ अपनी तरफ देखने लगा ,
और जरा सी बात पर राजनीती कि रोटियां सेकने लगा ,
और  इस  जमीन को उपजाऊ बना दिया ,खुद को और
अपनी आत्मा को भी इसमें सना दिया |
फिर इस जमीन कि खुराक पीकर अपनेको मोटा कर लिया ,
जबान गज भर क़ी और हाथों को छोटा कर लिया |
आज वो चेहरे हमारे बीच नहीं हैं 
मगर मैं अपने आप को उनकी नजरों से नहीं बचा सकता ,
उनसे किये हुए वायदों को नहीं पचा सकता ,
वो जैसे आज भी पूछ रहे हों कहाँ है आजादी ?,कहाँ है स्वतंत्रता ?s
ऐसे मैं पहाड़ के विकाश क़ी दर क्या हो सकती है 
कहने क़ी जरूरत नहीं |
मगर मुझे विश्वास है किजब लोग इस नर्क से ऊब जायेंगे 
झूठ फरेब ,विश्वासघात के दल दल में गले गले डूब जायंगे |
तब वो तुझे पहचानेंगे |
तेरी मिटटी में ऐसे देश भक्त  पैदा होंगे जो तेरी काया को कंचन बनायेंगे |
तेरी खोई सम्पदा ,सम्मान  तुझे वापस दिलाएंगे |
में स्पस्ट सुन रहा हूँ हवा कि लहरों में कुछ स्वर उभर रहे हैं ,
कुछ मानव समूहों  के स्वर  मेरे कानों  में गूँज रहे हैं
जय उत्तराखंड....जय उत्तराखंड....|
                               
                   भगवान सिंह रावत ( स्वरचित )

Sunday, November 13, 2011

आम आदमी


मैं  एक  आदमी  हूँ |
जी  हां  एक  आम  आदमी 
सदियाँ  गुजर  गई  मगर  मैं आज भी वहीँ का वहीँ 
खड़ा हूँ अपनी  समस्या को लिए हुए 
सड़कों  की  ख़ाक  छानता  हुआ 
जंतर  मंतर  की  सीढिया नापता  हुआ 
बेहाल  थका  सा  हांपता  हुआ 
एक  अनंत  युद्ध  लड़  रहा  हूँ |
मुझे  लेकर  जब   भी  कोई  आवाज  उठती  है 
तब  आवाज  कई  आवाजों  मैं बदल  जाती  है 
एक तूफ़ान  सा  उठता  हँ हर कोई मेर साथ चल   
पड़ता  है ऐसा  लगता  है जैसे  समंदर  मैं 
लहरें  उथल  पुथल  कर  देगी  |
उस  समय  मैं अपने  आपको    
महत्वपूर्ण  समझने  लगता हूँ
जैसे मरे  ही  दम पर   
सब  कुछ  चल  रहा  है  लगता है
जैसे बहुत  बड़ा बदलाव आने  वाला है|
इतनी  दूर  से  आये  ऐसे  चेहरे  देखने  को  
मिलते  हैं कि हैरानी   होती  है 
उन  मशहूर चेहरों  को देख  कर लगता है जैसे मैं 
भी  एक मशहूर  चेहरा  हूँ   मगर ...
यह  मेरा  भ्रम   होता   है  जैसे  जैसे समय 
बीतता  है शब्द कोष  मुझे  चिढाने  लगता  है 
जिस  मैं  एक  शब्द   कई  अर्थों  से  लिप्त  है 
प्रयावाची  शब्द   मुझपर  ठहाके  लगाते  हैं 
धीरे  धीरे  वो  आवाजें  बदलने  लगती  हैं 
जिसमें  वो पहले  वाली  आवाज  कहीं  नहीं  है 
मुझे  महसूस  होता  है 
कि  मै  सबसे  पीछे  रह  गया   हूँ |
कुछ   समय    बाद  सब  जैसे  झील  की  तरह 
शांत   होजाता  है एक खामोशी  छा  जाती  है |
और  मैं  फिर  अकेला  होजाता  हूँ 
जैसे  एक  आम  आदमी  होता  है 
और  सडकें  फिर  सूनी  होजाती   हैं
जंतर   मंतर   की  सीढियां  
किसी   और  के  इंतज़ार  मैं  व्याकुल  होने  लगती  है 
मैं  समझ  नहीं  पाता  की  जो  थोड़ी  देर  पहले  तूफ़ान  उठा  था 
उससे  किसी  को  कुछ  मिला  या  नहीं 
कम  से  कम  मझे  तो  कुछ  नहीं  मिला है |
क्यों कि  मुझे   आप  आज  भी  
सड़कों  पर  उसी तरह  देख  सकते  हैं 
टूटा  सा  थका  सा
बस  स्टॉप  पर  हैरान  सा 
राशन   कि  लाइन  मैं परेशान  सा
दफ्तर  मै   चिंतित  सा 
घर  आकर  ग़मगीन  सा 
मेरा  जीवन  अभिशप्त  है  या  मेरा  नाम 
क्यों  कि  मुझे  मालूम  है  
जिन  से  मै  ये  लड़ाई  लड़  रहा  हूँ 
वो भी कभी  मेरे  साथ  हुआ  करते  थे 
क्या  मैं ये समझ  लूं  कि ये  एक  सामाजिक  व्यवस्था  है ?
अगर  ऐसा  है तो मैं  ही  क्यों  इस  व्यवस्था  को  ओढ़  कर  बैठा  रहूँ 
समाज  मैं  व्यवस्थाएं  और  भी  होंगी 
जिन्हें  तुम  लोगों  ने  जन्म  दिया  है |
जिन्हें  बनाने  वाले  मुझ  से  हो  कर  गुजरे  होंगे 
मगर मैं  वचनवद्ध   हूँ सब के  साथ  जुड़े  रहने  को 
क्यों के मै तुम्हारा  सब का  बनाया  हुआ एक प्रतीक   हूँ
जो अब  तक  अपने  वसूलों 
पर  चल  रहा हूँ एक मै ही तो हूँ
जिसकी शपथ  सब खाते  हैं 
और फिर मेरे कंधे  पर पैर  रख कर  उपर  चढ़  जाते  हैं 
क्यों  कि  मुझे  पूछने  वाला  कोई  नहीं  है 
सदियों  से  मैं  कुचला  जाता   हूँ  
मेरी  आवाज़  का  दमन  होता  है 
मुझ पर लाठी  चार्ज  होता  है  
मुझ न जाने  कैसी  कैसी 
संज्ञाओं  से  परिभाषित  किया  जाता  है
सबकुछ  सहा  है  मैंने 
मगर  मुझे मिला  कुछ  नहीं, 
क्या मेरा ये युद्ध   कभी समाप्त   होगा ?
क्या  मुझे  कभी  मुक्ती  मिलेगी ? शायद   नहीं, 
क्योंकि  मै  एक आदमी  हूँ  जी  हाँ  एक  आम  आदमी …..