उत्तराखंड बनने से पहले लिखी गई कविता
बिछोह का दर्द
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ऐमेरे प्राणों से प्यारे पर्वतीय प्रदेश
तेरे पथ के एक शिला खंड पर बैठा आज तुझ से
बिछड़ने का दर्द महसूस कर रहा हूँ |
लहलहाती शीतल हवांयें
ऊँची पर्वत श्रंखलायें
इंद्र धनुषी रंग और कलरव करती सरिताएं |
उड़ते पंछियों के स्वर
बहते झरने इधर उधर
दूर घने जंगलों का सैलाब
जहाँ तक न पहुंचे नजर |
हम सच मुच अभागे हैं
जो तेरी संपदा को छोड़कर
तुझ से मुंह मोड़कर
जारहे हैं दूर शहरों मैं
दिखावे का लावादा ओढ़कर |
जी भरकर रोलेने को मन करता है
गला भर आया है
आंसू हैं कि थमते ही नहीं |
मन करता है तेरी जमीन पर लोटपोट होजाऊँ
तुझे गले लगाऊं
ताकि लोग मुझे तुझसे अलग ना कर सकें |
वो तो हमारे पहाड़ मैं बिछड़ने से पहले रोने का रिवाज है ;
वर्ना लोग मुझे देखकर हँसते ,फिकरे कसते ,
मेरे साथ चलने वाले लोग जाने किस मिटटी के बने हैं ,
कितना उल्लास है इनमे शहर जाने का
किल्लत का जीवन जीकर खाने कमाने का |
अगर तू माँ है तो तेरे आँचल में मेरे लिए दूध नहीं है
वक्त कि तेज रफ़्तार ने तेरे आँचल को काट काट कर छलनी कर दिया है |
अगर तू पिता है तो तेरे पास मुझे खिलने को पर्याप्त अन्न नहीं है
मौसम कि हर नई फसल पर तेरे हाथों क़ी रोटी का आकार छोटा हो जाता है |
बहुत बड़ी विडंबना है यह कि एक पुत्र को पता चले कि पिता के पास उसे देने को कुछ नहीं है |
मुझे याद है कुछ दशक पहले के वो वृद्ध चेहरे ,
जो स्वतंत्रता के नाम पर खिल उठे थे
लगा था जैसे हमें एक आसमान मिलगया हो
आजादी नहीं जैसे भागवान मिलगया हो
मगर वो चेहरे मुस्कुराये भर थे कि हंसी मायूसी में बदल गई
उगती सुबह हाथ लगी थी सांझ ढल गई |
विकाश के नाम पर वोटों और वायदों कि राजनीती ने आदमी को अँधा बना दिया
लोगों ने काम काज छोड़ राजनीती को धंदा बना दिया ,
आदमी समाज कल्याण को छोड़ अपनी तरफ देखने लगा ,
और जरा सी बात पर राजनीती कि रोटियां सेकने लगा ,
और इस जमीन को उपजाऊ बना दिया ,खुद को और
अपनी आत्मा को भी इसमें सना दिया |
फिर इस जमीन कि खुराक पीकर अपनेको मोटा कर लिया ,
जबान गज भर क़ी और हाथों को छोटा कर लिया |
आज वो चेहरे हमारे बीच नहीं हैं
मगर मैं अपने आप को उनकी नजरों से नहीं बचा सकता ,
उनसे किये हुए वायदों को नहीं पचा सकता ,
वो जैसे आज भी पूछ रहे हों कहाँ है आजादी ?,कहाँ है स्वतंत्रता ?s
ऐसे मैं पहाड़ के विकाश क़ी दर क्या हो सकती है
कहने क़ी जरूरत नहीं |
मगर मुझे विश्वास है किजब लोग इस नर्क से ऊब जायेंगे
झूठ फरेब ,विश्वासघात के दल दल में गले गले डूब जायंगे |
तब वो तुझे पहचानेंगे |
तेरी मिटटी में ऐसे देश भक्त पैदा होंगे जो तेरी काया को कंचन बनायेंगे |
तेरी खोई सम्पदा ,सम्मान तुझे वापस दिलाएंगे |
में स्पस्ट सुन रहा हूँ हवा कि लहरों में कुछ स्वर उभर रहे हैं ,
कुछ मानव समूहों के स्वर मेरे कानों में गूँज रहे हैं
जय उत्तराखंड....जय उत्तराखंड....|
भगवान सिंह रावत ( स्वरचित )