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Tuesday, May 16, 2023

प्रेतनी


 

आज पूरे एक साल बाद दीपू अपने गाँव जा रहा था , दिल्ली से पहाड़ जाने की खुसी उसे अंदर ही अंदर रोमांच से भर रही थी , शाम को वह गाड़ी से उतरा तो सूरज ढलने को था , उतरते ही उसने बैग हाथ मे लिया और सामने चाय की दुकान पर चाय पीने बैठ गया ,  वह चाय जल्दी खत्म कर लेना चाहता था ,ताकि वह जल्दी घर पहुंच सके । मगर जैसे ही वह चाय पीकर उठने लगा , तेज आंधी के साथ बारिश पड़ने लगी , दीपक का दिल बैठने लगा , अब घर कैसे पहुंचेगा , अंधेरा भी धीरे धीरे छाने लगा था , लगभग आधे घंटे तक बारिश होती रही , अब समय काफी हो गया था ,मगर दीपू को तो जाना ही था अपने घर । दीपक बेग उठाकर चल पड़ा अपने गांव के रास्ते पर , अब रात हो या अंधेरा , कुछ भी हो ,अपने मन मे अपने ईष्ट देवता का ध्यान कर वह चल पड़ा । दीपक बीस बाइस साल का हट्टा कट्टा नौ जवान था  दिल्ली में एक होटल में कुक था । घर मे वृद्ध माँ और बाबा थे । पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर गांव आरहा था ।लगभग पैदल का रास्ता एक घंटे का था बीच मे घना जंगल भी पड़ता था । दीपू को और किसी का डर ज्यादा नही था , सिवाय जंगली जानवरों के अलावा वह किसी से भय नही खाता था ।  गाड़ी ने उसे जहां छोड़ा वहां से उसका गांव सामने दिखता दिखता था मगर जंगल का रास्ता तो जंगल का ही होता है , सियार और लकड़ बग्घा जैसे जानवर तो मिल ही सकते थे । उसे पता था कि बाघ की गुफा गांव की दूसरी तरफ थी मगर फिर भी कुछ हो सकता है , जंगल किसी तरह के कानून को नही मानता , वहां उसका अपना कानून चलता है , दीपक ने अपनी सुरक्षा के लिए  सामने एक बड़े झाड़ से मोटा डंडा तोड़ लिया ,  और बेधड़क होकर तेज कदमों से चल पड़ा , उसके पास छोटी टोर्च थी , मगर ऊबड़खाबड़ रास्ते मे टोर्च होने पर भी इतनी तेजी से नहीं चला जा सकता । मनुष्य भले ही अपने आपको कितना ही निडर साबित करे , मगर अंदर से से एक कोने में थोड़ा बहुत डर अवश्य होता है ,वही डर दीपक के अंदर भी था । तेज कदमों से चलता हुआ वह आगे बढ़ता जा रहा था , अचानक जरा सी आहट पर वह चौंक पड़ता था , किसी जानवर की थोड़ी आवाज पर वह हड़बड़ा जाता था , उधर एक मुसीबत और , बारिष फिर से होने को थी , बिजली की चकाचौंध और आवाज अचानक माहौल में डर पैदा कर देती थी , आधे से ज्यादा रास्ता वह तय कर चुका था , तभी अचानक तेज बारिश होने लगी , दीपक झल्ला उठा , सारे काम आज उल्टे ही होने ही थे । वह काफी नजदीक पहुंच चुका था , तभी उसे गांव से पहले काफी दूर पर एक टुटा फूटा मकान दिखायी  दिया , उसे याद आया अरे हाँ ये तो कान्ता मौसी का मकान है , उसे बुढ़िया को लोग कांता मौसी कहा करते थे , के लोग उसे पागल भी कहते थे , वह अकेली रहती थी ,उस घर मे । कभी किसी के यहां खाने बैठ जाती , कभी किसी के यहां भी ठहर जाती थी  ।  कभी कभी वह बे सिरपेर की बातें करने लग जाती थी , कभी अचानक कई कई दिन तक गायब हो जाती , कभी अचानक दिख जाती थी दीपक को उसमे हल्की रोशनी दिखाई दी । तेज बारिश से बचने के लिए झट वह उसमे घुस गया , अंदर आकर उसने देखा ,बुढ़िया चारपाई पर लेटी थी , " कौन है रे "उसकी आवाज आई ।
" मैं हुं मौसी दीपू " ,"अभी जाग रही हो " दीपक ने कहा ।
" कहां से आ रहा है अभी " बुढ़िया बोली
" अरे मौसी दिल्ली से आ रहा हूँ , बारिस तेज हो रही है , भीग गया हूं " ।
" अच्छा अच्छा बैठ जा " बुढ़िया बोली
" देख केतली में चाय रखी है ठंड लग गई होगी तुझे चाय पीले " ।दीपक ने देखा केतली में चाय थी , और  गरम थी, उसे ताज्जुब हुआ मांग कर खाने वाली बुढ़िया मौसी के यहां ये सब , खैर उसने चाय एक गिलास में निकाली और बोला "मौसी तुम्हेभी दूं    "  " हाँ देदे थोडी "  , दीपक ने एक गिलास में उसे भी देदी बारिस के बाद चाय की चुस्कियों का मजा ही कुछ और होता है ,  दीपक चाय पीने लगा , उसने देखा कमरे में से सामान करीने से रखा था , और खाने पीने का सारा सामान मौजूद था , उसे आश्चर्य हुआ , टूटे फूटे घर मे सब सामान , जो बुढ़िया मांग कर खाती हो , उसके यहां ये सब ?
बुढ़िया चारपाई पर उठकर बैठ गई , उसने बुढ़िया के चेहरे पर गौर से देखा , तो वह सिहर गया , चेहरा बदला बदला सा लगा , जैसे बाल बिखरे से , नाक लंबी सी , आंखे सुर्ख लाल सी , उसने मन का वहम समझ अपने को संयत कर फिर से देखा तो वह डर गया ,  ऐसे कैसे हो सकता है ?  वह वहां से जल्द भागना चाहता था  , मगर तेज बारिश अभी भी हो रही थी । तभी बुढ़िया बोली " ऐसी बारिश में कहां जाएगा दीपू बेटा , रुका रह "
अब तो दीपक का  बचा खुचा साहस भी टूट गया , उसे कैसे पता चला कि मैं ऐसा सोच रहा हूँ , वह अंदर से बुरी तरह डर गया , चाय पीने के बाद बुढ़िया हंसते हुए बोली " डर मत " और उसका चाय का गिलास और अपना गिलास हाथ मे ले कर बोली ,  " ये कुछ खास बात नही है " और  झूठे गिलासों को  आठ दस  फुट दूर जहां और झूठे बर्तन  रखे थे रखने को बोली , फिर अचानक बुढ़िया ने कहा "अच्छा रहने दे तू " और वहीं से बैठे बैठे ही हाथ इतना लंबा कर दिया कि वह झूठे बर्तनों तक पहुंच गया । दीपक ये सब देख कर बुरी तरह डर कर सहम गया , आठ दस फीट लंबा हाथ कैसे हो गया ,बुढ़िया ये सब करते हुए भयानक तरह से हंस रही थी ।
दीपक ये देख कर बुरी तरह डर गया उसकी चेतना लुप्त हो गई  , और वह बेहोश हो गया ।
अपने मुह पर पानी के छींटे पड़ते ही वह चौक  पड़ा और उठ बैठा , कान्ता मौसी .....कान्ता मौसी.......। "कहाँ है कान्ता  मौसी " ? एक महिला ने उससे पूछा , " अभी यहीं तो थी , कहां गई "  ? । उसने उन दो तीन महिलाओं को आश्चर्य से देखा , उसने बाहर देखा सुबह हो चुकी थी ।
"दीपू  क्या हुआ तू यहां कैसे " एक महिला ने उससे पूछा
तब उसने रात का सारा किस्सा सुना दिया  ।
" अरे हम तो यहाँ घास काटने आये थे , तो देखा यहां का दरवाजा खुला है , वैसे यहां तो पिछले चार महीने से ताला लगा हुआ रहता है ,सोचा चलो देखते हैँ  " ।
" तो क्या  कान्ता मौसी अब यहां नही रहती " ?
" तुम्हे पता भी है कान्ता मौसी को मरे हुए पूरे चार महीने हो चुके हैं "।
" क्या  कह रही हो दीदी " ? दीपक बोला
" हाँ हाँ ठीक कह रही हूं मैं "
दीपक  के पैरों तले जमीन खिसक गई ।, तो क्या सारी रात वह प्रेतनी के साथ रहा , तभी कोई दीपक की मां को बुला लाया ,  वह दीपक को घर ले गई , दीपक घर आया तो उसकी मां ने अपने ईष्ट देवता का दिया जलाया और कुछ चावल के दाने उसके सिर पर घुमा कर चारो दिशाओं में पूज दिए , और टीका लगा दिया  ।
आज भी दीपक उस घटना को याद कर सिहर उठता है । लोगों का मत है कि कान्ता मौसी दूर से कभी कभी वहां दिखाई पड़ जाती है ,उस जगह पर नजदीक जाने की हिम्मत तो कोई कोई करता नही है ।
                      समाप्त
                                 भगवान सिंह रावत  दिल्ली