शांत चित्त होकर रघुवीर
बैठ गए सागर के तीर
योद्धा सारे मौन खड़े थे
पर लक्ष्मण थे बहुत अधीर ।
संध्या बीत निशा घिर आई
नए दिवश ने ली अंगड़ाई
नम्र विनय कर रत्नाकर को
बाधा रघुवर ने समझाई ।
तीन दिवश भी बीत गए जब
प्रतिक्रिया कुछ नही हुई जब
नींद नही टूटी सागर की
धैर्य राम का टूट गया तब ।
क्रोधित हरि बोले "जलधाम "
,सारे प्रयत्न कर चुका है राम
बिनय नहीं होंगी अब तुझसे
अब होगा केवल संग्राम ।
बिन जल के अपना हाल देख
धरती पर पाताल देख
विनम्रता को निर्बल समझा
अब रूप मेरा विकराल देख
क्रुद्ध होकर अनुज को बुलाया
और अपना आयुध मंगवाया
खींच कमान की प्रत्यंचा को
उस पर अग्नि बाण चढ़ाया ।
डोल गया धरा का कण कण
काँप उठा सम्पूर्ण गगन
असमय ही चल पड़ी आंधियां
गरज उठे आकाश में घन ।
चमक उठी चपला चहुँ ओर
भीष्म घटा छाई घनघोर
मचल उठा सरिताओं का जल
लहरें उठ उठ करती शोर ।
ज्यों ही कर अग्नि आह्वान
तीर प्रत्यंचा पर ज्यों तान
रौद्र रूप धर हरि ने ज्यों ही
सागर का किया संधान ।
त्राहिमान तब करते करते
बाहर आया सागर जल से
नतमस्तक हो हाथ जोड़ कर
किया निवेदन डरते डरते ।
दया करो हे कृपा निधान
आपका ही है ये वरदान
मेरी मर्यादा टूटी जो
नही रहेगा विधि विधान ।
राम ने सब वृतांत बताया
विधिवत सागर को समझाया
सेना को बस मार्ग चाहिए
सन्मुख संकट को दोहराया ।
तब सागर ने युक्ति सुझाई
नल और नील हैं दोनों भाई
उनको जो वरदान मिले हैं,
प्रभु को पूरी कथा सुनाई ।
शांत चित्त हो क्रोध विसार
उत्तर दिशा में किया प्रहार
अमोघ अस्त्र से प्रभु ने तब
दशयुओं का किया संघार ।
बाधा का समाधान हुआ
कार्य सम्पूर्ण महान हुआ
सागर ने भी साथ निभाया
विधिवत सेतु निर्माण हुआ
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
