कैसा ये रंग है
जीवन के मूल्यों का ये कैसा रंग है
शब्दों से जख्म मिले कैसी ये जंग है।
अपने बेगानों मे नफरत का मंजर है
भेद भरी बातों में कटुता का खंजर है
अंतर की पीड़ा को कब कोई जाना है
कर्कश है वाणी और स्वभाव जर्जर है
तीखे प्रहारों का अपना ही ढंग है
जीवन के मूल्यों का कैसा ये रंग है।
असहाय जीवन बोझ होजाता है
सामर्थ्य का भी स्वार्थ से नाता है
पार कोई कैसे भंवर से निकले
पथ कोई और नजर नाहीआता है
सक्षमता पूरी है पर राहें तंग है
जीवन के मूल्यों का कैसा ये रंग है।
दुविधा के जंगल मे ये कैसी रीत है
वैभव और माया में उलझ गई प्रीत है
सपनो का टूटना टूटकर बिखरना
क्या माने जीवन की हार है या जीत है
कामनाएं हताश हैं उम्मीदें दंग हैं
जीवन के मूल्यों का कैसा ये रंग है।
अपना पुरुषार्थ और अपनी ही भाषा हो
कर्म के हाथों में छोटी सी आशा हो
एक टुकड़ा धूप का अंजुली भर छांव हो
एक मुट्ठी आसमां इतनी अभिलाषा हो
जीवन के गीत का ये नूतन प्रसंग है ।
जीवन के मूल्यों का ये कैसा रंग है
शब्दों से जख्म मिले कैसी ये जंग है।
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
