धीरे धीरे बीत गए सब
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धीरे धीरे बीत गए सब
मांग के लाये थे जो दिन
कुछ बीते अर्जित करने में
कुछ बीते तारे गिन गिन
रोता आया हंस ना सका
मुठी में कुछ कस ना सका
घऱ तो बहुत बनाये लेकिन
कभी उनमे खुद बस न सका
पल में फिसल गये मुठी से
जीवन के प्यारे पल छिन।
धीरे धीरे ...................।
तांक झांक जीवन भर की
खुद में कभी न झांक सका
सबका मोल लगाया तूने
खुद को कभी न आंक सका
खुद में ही खो गया तू खुद ही
खुद से तो खुद गया है छिन।
धीरे धीरे....................।
सूरज को बस धुप ही समझ
छाँव को समझ गया अंधियारा
धरती को बस मिट्टी समझा
और सोच को किया किनारा
रात को रात न।समझा सका
और ना समझा दिन को दिन।
धीरे धीरे बीत गए सब
मांग के लाये थे जो दिन
कुछ बीते अर्जित करने में
कुछ बीते तारे गिन गिन .
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
