भीड़ भरे इस कोलाहल से
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भीड़ भरे इस कोलाहल से
दूर कहीं चलते हैं
चल दूर कहीं चलते हैं।
चित परिचित व्यवहार भी देखे
चेहरे पर संस्कार भी देखे
संघर्षों से टूट चुके जो
बहुतेरे लाचार भी देखे झूटी शान दिखाने वाले
भीतर से बीमार भी देखे
सच का गला दबाने वाले
झूठ के पहरेदार भी देखे
ईर्ष्या ध्वेष और घृणा देखी
नफरत के बाजार भी देखे
आस्थाओं में छुप कर बैठे
झूठे और मक्कार भी देखे
स्वार्थ के इस सैलाब मे लोग
नित नित अक्स बदलते हैं।
दूर कहीं चलते हैं
चल दूर कहीं चलते हैं।
चित परिचित व्यवहार भी देखे
चेहरे पर संस्कार भी देखे
संघर्षों से टूट चुके जो
बहुतेरे लाचार भी देखे झूटी शान दिखाने वाले
भीतर से बीमार भी देखे
सच का गला दबाने वाले
झूठ के पहरेदार भी देखे
ईर्ष्या ध्वेष और घृणा देखी
नफरत के बाजार भी देखे
आस्थाओं में छुप कर बैठे
झूठे और मक्कार भी देखे
स्वार्थ के इस सैलाब मे लोग
नित नित अक्स बदलते हैं।
दूर कहीं चलते हैं।
गांव उजड़ कर शहर बन गए
ये कैसा विकाश हुआ।
संस्कारों की जली चिताएं
परंपरा का नाश हुआ।
अपने सभी हो गए पराये
परदेशी पर खास हुआ।
सच से दूर हुए हैं अक्सर
झूठ पे झट विस्वास हुआ।
अयोग्यता को मान मिला
प्रतिभा का परिहास हुआ।
परिश्रम से विमुख आदमी
और वैभव का दास हुआ।
गलियारे तो चीख रहे हैं
महल में हर्षोल्लास हुआ।
मानवता की धरती पर क्यों
अंतर इतना खास हुआ।
बंद किताबों के नायक क्यों
बाहर नही निकलते हैं।
चल दूर कहीं चलते हैं।
नकली चेहरे पहन के होता
अतिथि का सम्मान यहां
बिकी हुई दीक्षा से करते
सब गुरुओं का मान यहां
बंटी हुई श्रद्धा से होता
ईश्वर का गुणगान यहां
बैभव भरे पात्र में अक्सर
बरस रहा है दान यहां।
समृद्धि के बल पर पलते
हैं नकली भगवान यहां।
भ्रष्ट व्यवस्था मे कैसे हो
असली की पहचान यहां।
साधू की टोली मे छुपकर
बैठा है शैतान यहां।
भ्रष्ट चपल अधम से ऊपर
आज नही इंसान यहाँ।
करुणा दया भाव देखकर
पत्थर नही पिघलते हैं।
नकली चेहरे पहन के होता
अतिथि का सम्मान यहां
बिकी हुई दीक्षा से करते
सब गुरुओं का मान यहां
बंटी हुई श्रद्धा से होता
ईश्वर का गुणगान यहां
बैभव भरे पात्र में अक्सर
बरस रहा है दान यहां।
समृद्धि के बल पर पलते
हैं नकली भगवान यहां।
भ्रष्ट व्यवस्था मे कैसे हो
असली की पहचान यहां।
साधू की टोली मे छुपकर
बैठा है शैतान यहां।
भ्रष्ट चपल अधम से ऊपर
आज नही इंसान यहाँ।
करुणा दया भाव देखकर
पत्थर नही पिघलते हैं।
चल दूर कहीं चलते हैं
भीड़ भरे इस कोलाहल से
दूर कहीं चलते हैं।
चल दूर कहीं चलते हैं।
भगवान सिंह रावत
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
भीड़ भरे इस कोलाहल से
दूर कहीं चलते हैं।
चल दूर कहीं चलते हैं।
भगवान सिंह रावत
(सर्वाधिकार सुरक्षित)