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Saturday, December 17, 2016

आदमी


         आदमी 

आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी
हित  की बात को छोड़ के कांटे बोने  को मजबूर आदमी
सचाई से विमुख रहे झूटे  को हमराज बनाये
पल भर मैं ही जुबान से फिसले बे सर पैर  की बात बताये
चेहरे से चेहरा ढकने को दुनिया मैं मशहूर आदमी
आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी
अपना कुछ सहयोग नहीं व्यवस्थाओं पर दोष लगाए
अपने अंदर कभी न झांके आसमान को सर पे उठाये
खुद बदलाव के मुद्दे पर कभी न हो मंजूर आदनी
आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी
जहरेली मुस्कान बिखेरे वैभव को बस चरता  जाये
खुद निरर्थक होकर वो सार्थकता के पाठ पढाये
तन स कोमल होकर भी मन से कितना क्रूर आदमी
आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी
मनकी बात न समझ में  आयी और पीटता  रहा लकीर
बनते जुड़ते रहे काम सब और टूटता  रहा जमीर
आहित  की बात को छोड़ के कांटे बोने  को मजबूर आदमी
आडंबरों  को ढोते ढोते थक कर हो गया चूर आदमी
आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी

           भगवान सिंह रावत  (सर्वधिकार सुरक्षित )