सावन और बदली
पास पास है
धुप छाँव में
कुछ तो ख़ास
है
चांदनी भी
चाँद से शरमाने
लगी है
कविताओं के शहर
में
दोहों के नगर
में
गीत बहने
लगे है
हर किसी प्रहर
में
गीत उजले उजले
हैं
कहानियां गले लगाती
हैं
मुश्कुराकर
हर ग़ज़ल
किताब में छुप
जाती है
मुक्क्तक छणिकायें भी
नए अर्थ बताने
लगी हैं
अब मुझे तुम्हारी
बहुत याद आने
लगी है
फूल खिले हैं
भँवरे आ रहे
हैं
अपनी मस्ती में गुनगुना
रह हैं
बाग़ का हर
पत्ता हर शाख
बेवजह मुश्कुरारहे हैं
बाहर चमन में
आचुकी है
हवा के झोंके
बता रह हैं
हरियाली भी अपना
रंग दिखाती है
बेल भी तने
से लिपट लिपट
जाती है
पत्तियां आज फूलों
का पता बताने
लगी है
अब मुझे तुम्हारी
बहुत याद आने
लगी है
मन को
महकाती नूतन सी
भोर है
दूर कहीं जंगल
मैं पंछियों का
शोर है
वादियों में अजीब
सी महक आ
रही है
हरियाली दिखती है वृक्ष लहराते
हैं
अपने अंदाज़ मैं हवाएं
गुनगुनाती हैं
नदिया की लहरें
शोर मचाती हैं
तीतर बटेर विचरते हैं
बया प्यार से देखती
है
कोयल गीत सुनाती है
एक मुस्कान उभरती है
जब
शुखद स्वप्न आते हैं
ख्याबों के क्या कहने
क्या क्या थमा जाते हैं
उम्मीदें सच को मानाने
लगी हैं
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
सावन और बदली
पास पास है
धुप छाँव में
कुछ तो ख़ास
है
चांदनी भी
चाँद से शरमाने
लगी है
