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Wednesday, August 3, 2016

तुम्हारी याद

अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
जीवन से  उम्मीद का नाता टूट गया है
कसमों ,वादों का साथ छूट गया है
साँझ के दिए की लौ टिमटिमाने लगी है
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
दूर दूर तक गहरी ख़ामोशी छा  रही है
इठलाती बलखाती निशा
उजाले को चिढ़ाती
संध्या से बतियाती
अन्धकार के आगोश मैं जा रही है
हार जीत का पारम्परिक युद्ध होने लगा है
हौसले, इरादे  दूर खड़े हैं
आस ,उमंग बेसुध पड़े हैं
साहस हताश हो डरकर रोने लगा है
सच  खामोश हो गया है
झूट जाने कहाँ खो गया है
अजीब स्तिथि है ये सबको क्या हो गया है
सब जैसे मुह छिपा रहे हैं
इधर उधर दौड़ते ,भागते
अजीब तरह का अपना व्यवहार दर्शा रहे हैं
दूर छितिज़ से अब लालिमा भी जाने लगी है 
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है ।
कितना रंग बदलेगी ये दुनिया
हर शख्स उसी रास्ते पर निकल जाता है
चार सीढ़ियां चढ़कर पहली सीढ़ी को भूल जाता है
 अपना पुराना  चेहरा हटाकर नया चेहरा लगाता है
गैर खता करे तब भीअपनों का दिल जरूर दुखाता है
क्या नहीं सहा उस बेचारे ने अपने सीने पर                      मगर अक्सर पत्ता पेड़ को ही दोषी बताता है
तुमने तो  अभिलेख गढ़ दिया
किसी और का दोष किसी और के सर मढ़  दिया
वर्तमान ने किस कदर अपने ही इतिहास के
मुह पर तमाचा जड़ दिया ।
अनुभव से सबने नाता तोड़ दिया है
प्रतिभाओं का स्वाभाव बदल गया है
वक्त खुद से आगे निकल गया है
आश्रीवाद ने आडंबरों से खुद को जोड़ लिया है
प्यार के फूल उगाये थे हमने जिंदगी मैं
ये काँटों की फसल कौन उगाकर चला गया 
हमने जरा नजर क्या घुमाई
झमेलों  में थोड़ी देर क्या लगाई
बातों बातों में कोई नफरत थमाकर चला गया
भूले से प्यार भी दिखाओ तो जिंदगी नफरत जताने लगी है
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
बाबाओं के इस देश में झूठ के परिवेश में
हर कोई अपने आप को भगवान बताता है
इंसान भी कस्तूरी की खोज में,भागता चला जाता है
जीते जी कोई  नहीं पूछेगा,मरने पर  रोयेगा पछतायेगा 
कभी बात की नहीं की चाह कर,बाद मैं गरुड़ पुराण बिठायेगा
आदमी अनचाही आस्था को ढ़ोने में लगा है
हित के लिए बने हाथों से,कांटे  बोने लगा है
अबला से किये पापों को,असहाय से मिले श्रापों को
गंगा के तट में डुबकी लगाकर धोने लगा है
पता नहीं क्या क्या कहाँ जोड़ने लगा है
पत्थर को  खुश करने के लिए फूल तोड़ने लगा है
ये कौन सी सुबह है,कौन सा सूरज निकल रहा है
अच्छाई मायूस है,बुराई को बल मिल रहा है
बुराई अच्छाई को अब पाठ पढ़ाने लगी है
अब मुझे तुम्हरी बहुत याद आने लगी है

       भगवान सिंह रावत   ( सर्वाधिकार सुरक्षित )