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Monday, September 21, 2015

मैं गीत बनाता जाऊंगा


       मैं गीत बनाता  जाऊंगा











मैं गीत बनाता  जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
काँटों से आहत उपवन में मैं  फूल उगाता  जाऊंगा
सदियों  से खामोश हो पर इकरार कभी तो होगा ही
मौसम  जब जब बदलेंगे इजहार कभी तो होगा ही
फूनों की रुत मैं मिलने का त्यौहार कभी तो होगा ही
बिरहा में जो अश्रु बहे सीने में छुपाता जाऊंगा
मैं गीत बनता जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
प्रीत छुपी मन में  ऐसे सीप मैं जैसे मोती
घोर भयावह अन्धकार मैं दीप की जैसे ज्योति
तरह तरह के फूलों को ये एक माला में  पिरोती
न्योछावर, नतमस्तक हों वो रीत बन|ता जाऊंगा
मैं गीत बनाता  जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
कुदरत ने ने प्रीत को  जन्म दियाकुदरत ही इसकी जाती है
धर्म कर्म सब कुदरत है कुदरत के गीत सुनाती है
भटक रही मानवता को ये सच्ची राह दिखाती है
कुदरत और मानव के मध्य सेतु बनाता जाऊंगा
मैं  गीत बनाता जाऊँगा मन मीत  बनता जाऊँगा
आज नहीं तो कल सही ऐसा भी युग आएगा
पुष्प गाएंगे गीत प्रीत के मनु संगीत सजाएगा
स्वर पंछी के सम्मलित होंगे और चमन मुश्कुरायेगा
बोल उठेंगे पत्थर भी वो आकाश बनाता जाऊँगा
मैं  गीत बनाता जाऊँगा मन मीत  बनता जाऊँगा
काँटों से आहत उपवन में मैं  फूल उगाता  जाऊंगा



                                          भगवान सिंह रावत