मैं गीत बनाता जाऊंगा
मैं गीत बनाता जाऊंगा
मन मीत बनाता जाऊंगा
काँटों से आहत
उपवन में मैं फूल
उगाता जाऊंगा
सदियों से
खामोश हो पर
इकरार कभी तो
होगा ही
मौसम जब
जब बदलेंगे इजहार
कभी तो होगा
ही
फूनों की रुत
मैं मिलने का
त्यौहार कभी तो
होगा ही
बिरहा में जो
अश्रु बहे सीने
में छुपाता जाऊंगा
मैं गीत बनता जाऊंगा
मन मीत बनाता जाऊंगा
प्रीत छुपी मन
में ऐसे
सीप मैं जैसे
मोती
घोर भयावह अन्धकार मैं
दीप की जैसे
ज्योति
तरह तरह के
फूलों को ये
एक माला में पिरोती
न्योछावर, नतमस्तक हों वो
रीत बन|ता जाऊंगा
मैं गीत बनाता जाऊंगा
मन मीत बनाता जाऊंगा
कुदरत ने ने
प्रीत को जन्म दियाकुदरत
ही इसकी जाती
है
धर्म कर्म सब
कुदरत है कुदरत
के गीत सुनाती
है
भटक रही मानवता
को ये सच्ची
राह दिखाती है
कुदरत और मानव
के मध्य सेतु
बनाता जाऊंगा
मैं गीत
बनाता जाऊँगा मन
मीत बनता
जाऊँगा
आज नहीं तो
कल सही ऐसा
भी युग आएगा
पुष्प गाएंगे गीत प्रीत
के मनु संगीत
सजाएगा
स्वर पंछी के
सम्मलित होंगे और चमन
मुश्कुरायेगा
बोल उठेंगे पत्थर भी
वो आकाश बनाता
जाऊँगा
मैं गीत
बनाता जाऊँगा मन
मीत बनता
जाऊँगा
काँटों से आहत
उपवन में मैं फूल
उगाता जाऊंगा
भगवान सिंह रावत


