जिंदगी
चेहरो पर मुखौटे हैं इनको क्या देखें ,
भीतर कुछ और
ही होती जिंदगी ।
रात के अंधेरों
में जागती रहती
है ,
पल भर भी
नहीं सोती है
जिंदगी ।
दुनिआ के मेले
में झंझट झमेले
में,
बिलकुल अकेली ही होती है
जिंदगी ।
भीतर के जख्मो
को कब किसने
बांटा है ,
खुद अपना सलीब
ढोती है जिंदगी
।
बैभव समेटने को उम्र
कम पड़ती है
,
बदले में कितना
कुछ खोती है
जिंदगी |
जीवन के उपवन
मैं माया के बंधन
में,
रिश्तों के मोती
पिरोती है जिंदगी
|
खुद के गुनाहों
को कुदरत के घावों
को ,
आस्था की गंगा मे धोती है
जिंदगी |
खुद में जब
झाँका और दोषी
पाया ,
करुणामय होकर
रोती
है
जिंदगी |
चेहरे बदलते हैं इन
पर मत जाओ
,
भीतर कुछ और
ही होती जिंदगी ।