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Thursday, September 18, 2014

जिंदगी ।

             जिंदगी

चेहरो पर मुखौटे हैं इनको क्या देखें ,
भीतर कुछ और ही होती  जिंदगी
रात के अंधेरों में जागती रहती है ,
पल भर भी नहीं सोती है जिंदगी
दुनिआ के मेले में  झंझट झमेले  में,
बिलकुल अकेली ही होती है जिंदगी
भीतर के जख्मो को कब किसने बांटा है ,
खुद अपना सलीब ढोती है जिंदगी
बैभव समेटने को उम्र कम पड़ती है ,
बदले में  कितना कुछ खोती है जिंदगी |
जीवन के उपवन मैं माया के  बंधन   में,
 रिश्तों के मोती पिरोती है जिंदगी  |
खुद के गुनाहों को कुदरत के घावों को ,
आस्था की गंगा मे धोती है जिंदगी |
खुद में  जब झाँका और दोषी पाया ,
करुणामय  होकर  रोती  है जिंदगी |
चेहरे बदलते हैं इन पर मत जाओ ,
भीतर कुछ और ही होती  जिंदगी

            भगवान सिंह  रावत  (स्वरचित)