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Sunday, June 8, 2014

दौड़ती भागती है जिन्दगी

 दौड़ती भागती है जिन्दगी
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कितना दौड़ती भागती है जिन्दगी
नींद मैं भी देखो जागती है जिन्दगी ।
जन्म क्या लिया गुनाह करदिया
हर कदम पे सिला मांगती है जिंदगी ।
सपने बुनती है तोडती मरोड़ती है
अपने अनुभव से फिर उसे जोडती है ।
कुलांचे भरती है सब कुछ रौन्ध्ती है
पीछे नहीं देखती बस आगे ही दौड़ती है ।
नियमों के बंधन को ताक पर रख कर
खुद को कुछ अलाग ही आंकती है जिंदगी । कितना दौड़ती.........।
छोटी सी बात पर रूठ रूठ जाती है
अपनों को गैरों को सबको सताती है ।
सच के  उजाले को खुद मैं छुपाकर
झूठ के लबादे मैं खुद छुप जाती है ।
बदलते चेहरों की दुनिया मैं आकर
झूठ और फरेब को हांकती है जिंदगी । कितना दौड़ती..............।
कितना दुःख होता है जब अपनों को खोती है
करुणा के साये मैं खुद को पिरोती है ।
रोती है बिलखती हो लिपट लिपट जाती है
बैर भाव मन मुटाव आंसुओं से धोती है ।
दिल से लगाती हैै तब हर किसी चीज को
कुदरत के मूल्यों मैं जब झांकती है जिन्दगी ।
कितना दौड़ती भागती है जिन्दगी
नींद मैं भी देखो जागती है जिन्दगी ।
जन्म क्या लिया गुनाह कर दिया
हर कदम पे सिला मांगती है जिन्दगी ।