भूलती भटकती गुमराह सी जिंदगी
क्यूँ नहीं हो जाती एक राह सी जिंदगी ।
जीवन के मूल्यों को मिटाती बनाती है
नियमों के बाँध भी खुद ही लगाती है ।
गैरों का दखल मंजूर नहीं होता
छोटी सी बात पर रूठ रूठ जाती है ।
अपनों से गैरों से लड़ते झगड़ते
लगती है जैसे गुनाह सी जिंदगी । भूलती भटकती ……।
बड़े बड़े सपने पर जीवन तो बौना है
नियति के हाथों में हर कोई खिलौना है ।
वसुधा के साये में भ्रमित है हर कोई
यहीं से पाया है यहीं पर खोना है ।
उम्र नप जााती है कुछ ढूँढ़ते विचरते
लगता है जैसे चरवाह सी जिंदगी । भूलती भटकती ……।
अन्न तो बिखरा है खेतों खलियानों में
फूलों के मेले भी लगते बागानों में ।
सरिता का पावन जल सबके लिए है
फर्क नहीं होता उसके पैमानों मैं।
सबकुछ है फिर भी कुछ रीता सा लगता है
लगता है जैसे एक चाह सी जिंदगी। भूलती भटकती ……।
कभी कभी रोना है कभी मुस्कुराना है
रूठना है कभी और कभी मनाना है ।
अंदर कि पीड़ा तो खुद को ही सहनी है
अपना सलीब भी खुद ही उठाना है ।
हार कर जाना है कुदरत के साये मैं ।
लगता है जैसे पनाह सी जिंदगी ।
भूलती भटकती गुमराह सी जिंदगी
क्यूँ नहीं हो जाती एक राह सी जिंदगी ।
भगवान सिंह रावत