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Thursday, March 15, 2012

आदमी अकेला है


आदमी अकेला है 

भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है
अस्थाई डेरों में,बंदिशों के घेरों में, 
दिखावटी निमंत्रण ,बनावटी चेहरों में, 
चुभते उजालों में उफनते अंधेरों में, 
खबर पल की नहीं फिर भी है पहरों में, 
भाग रहा हर कोई गांव ,गांव शहरों में,
जीवन है कोई या कोई मेला है
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
नीरसता छाई है ,करुणा भर आई है ,
हर अपनी चीज लगती पराई है |
कोई नहीं साथ ,बस एक परछाई है |
त्रासदी के भंवर में किसने धकेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
जीवन जीवन नहीं ,ये तो एक ध्वंद है ,
अपने ढंग से जीने में ,हर कहीं प्रतिबन्ध है |
झूट दौड़ जीत रहा ,सच की गति मंद है |
सज्जन खामोश ,दुर्जन स्वछन्द है |
जन नायक आज भी पुस्तकों में बंद है |
खेल अटपटा सा किसने ये खेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
प्रबंधन खोटा है,सोने सा खरा नहीं,
मनमानी होती है, डर बिलकुल जरा नहीं|
हर साल फूंकते हैं पर ,दशानन मरा नहीं |
कलम को देख कर दुष्ट कभी डरा नहीं ,
कलम का सिपाही आज भी अकेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
गलत को गलत कहे किसकी ये मिशात है
टूट गया आदमी मेहनत से दिन रात है 
शोर कितना ही मचे , ढाक के तीन पात है ।
कुछ देर बवंडर उठा ,फिर झील जैसे शांत है
रात के बाद दिन है या दिन के बाद रात है ।
उलझा है जीवन कैसा ये झमेला है|
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|

                  भगवान सिंह रावत(स्वरचित)