Pages

Tuesday, February 21, 2012

आदमी

आदमी 

इस धरा से लुप्त हो किधर गया  है आदमी |
लगता है ऐसे कि जैसे मर  गया है आदमी |
नज़र  भी  धोका  खा  गई  पहचान करने में,
टुकड़ों मैं जैसे कहीं बिखर गया है आदमी |
शैतान की भी आँख में थोड़ी सी शर्म है,
उन हदों को भी पार कर गया है आदमी |
सराल औऱ सीधे सच्चे  लोग अब बचे कहां,
‘पागल’ क़रार उनको कर गया है आदमी ।
हर  तरफ  जंगल   कटे और महल बन गए ,
सामान  अपनी मौत का कर गया है आदमी |
फसल क्यों कर अब उगेगी तामसी  जमीन पर
आग ,तोप,गोले बो कर  गया है आदमी |
कौन है जो घूमता बेफिक्र सा होकर यहाँ 
अक्स जिसका  देखकर  डर गया है आदमी |

                    भगवान सिंह रावत (स्वरचित)