आदमी
इस धरा से लुप्त हो किधर गया है आदमी |
लगता है ऐसे कि जैसे मर गया है आदमी |
नज़र भी धोका खा गई पहचान करने में,
टुकड़ों मैं जैसे कहीं बिखर गया है आदमी |
शैतान की भी आँख में थोड़ी सी शर्म है,
उन हदों को भी पार कर गया है आदमी |
सराल औऱ सीधे सच्चे लोग अब बचे कहां,
‘पागल’ क़रार उनको कर गया है आदमी ।
हर तरफ जंगल कटे और महल बन गए ,
सामान अपनी मौत का कर गया है आदमी |
फसल क्यों कर अब उगेगी तामसी जमीन पर
आग ,तोप,गोले बो कर गया है आदमी |
कौन है जो घूमता बेफिक्र सा होकर यहाँ
अक्स जिसका देखकर डर गया है आदमी |
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)