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Sunday, November 13, 2011

आम आदमी


मैं  एक  आदमी  हूँ |
जी  हां  एक  आम  आदमी 
सदियाँ  गुजर  गई  मगर  मैं आज भी वहीँ का वहीँ 
खड़ा हूँ अपनी  समस्या को लिए हुए 
सड़कों  की  ख़ाक  छानता  हुआ 
जंतर  मंतर  की  सीढिया नापता  हुआ 
बेहाल  थका  सा  हांपता  हुआ 
एक  अनंत  युद्ध  लड़  रहा  हूँ |
मुझे  लेकर  जब   भी  कोई  आवाज  उठती  है 
तब  आवाज  कई  आवाजों  मैं बदल  जाती  है 
एक तूफ़ान  सा  उठता  हँ हर कोई मेर साथ चल   
पड़ता  है ऐसा  लगता  है जैसे  समंदर  मैं 
लहरें  उथल  पुथल  कर  देगी  |
उस  समय  मैं अपने  आपको    
महत्वपूर्ण  समझने  लगता हूँ
जैसे मरे  ही  दम पर   
सब  कुछ  चल  रहा  है  लगता है
जैसे बहुत  बड़ा बदलाव आने  वाला है|
इतनी  दूर  से  आये  ऐसे  चेहरे  देखने  को  
मिलते  हैं कि हैरानी   होती  है 
उन  मशहूर चेहरों  को देख  कर लगता है जैसे मैं 
भी  एक मशहूर  चेहरा  हूँ   मगर ...
यह  मेरा  भ्रम   होता   है  जैसे  जैसे समय 
बीतता  है शब्द कोष  मुझे  चिढाने  लगता  है 
जिस  मैं  एक  शब्द   कई  अर्थों  से  लिप्त  है 
प्रयावाची  शब्द   मुझपर  ठहाके  लगाते  हैं 
धीरे  धीरे  वो  आवाजें  बदलने  लगती  हैं 
जिसमें  वो पहले  वाली  आवाज  कहीं  नहीं  है 
मुझे  महसूस  होता  है 
कि  मै  सबसे  पीछे  रह  गया   हूँ |
कुछ   समय    बाद  सब  जैसे  झील  की  तरह 
शांत   होजाता  है एक खामोशी  छा  जाती  है |
और  मैं  फिर  अकेला  होजाता  हूँ 
जैसे  एक  आम  आदमी  होता  है 
और  सडकें  फिर  सूनी  होजाती   हैं
जंतर   मंतर   की  सीढियां  
किसी   और  के  इंतज़ार  मैं  व्याकुल  होने  लगती  है 
मैं  समझ  नहीं  पाता  की  जो  थोड़ी  देर  पहले  तूफ़ान  उठा  था 
उससे  किसी  को  कुछ  मिला  या  नहीं 
कम  से  कम  मझे  तो  कुछ  नहीं  मिला है |
क्यों कि  मुझे   आप  आज  भी  
सड़कों  पर  उसी तरह  देख  सकते  हैं 
टूटा  सा  थका  सा
बस  स्टॉप  पर  हैरान  सा 
राशन   कि  लाइन  मैं परेशान  सा
दफ्तर  मै   चिंतित  सा 
घर  आकर  ग़मगीन  सा 
मेरा  जीवन  अभिशप्त  है  या  मेरा  नाम 
क्यों  कि  मुझे  मालूम  है  
जिन  से  मै  ये  लड़ाई  लड़  रहा  हूँ 
वो भी कभी  मेरे  साथ  हुआ  करते  थे 
क्या  मैं ये समझ  लूं  कि ये  एक  सामाजिक  व्यवस्था  है ?
अगर  ऐसा  है तो मैं  ही  क्यों  इस  व्यवस्था  को  ओढ़  कर  बैठा  रहूँ 
समाज  मैं  व्यवस्थाएं  और  भी  होंगी 
जिन्हें  तुम  लोगों  ने  जन्म  दिया  है |
जिन्हें  बनाने  वाले  मुझ  से  हो  कर  गुजरे  होंगे 
मगर मैं  वचनवद्ध   हूँ सब के  साथ  जुड़े  रहने  को 
क्यों के मै तुम्हारा  सब का  बनाया  हुआ एक प्रतीक   हूँ
जो अब  तक  अपने  वसूलों 
पर  चल  रहा हूँ एक मै ही तो हूँ
जिसकी शपथ  सब खाते  हैं 
और फिर मेरे कंधे  पर पैर  रख कर  उपर  चढ़  जाते  हैं 
क्यों  कि  मुझे  पूछने  वाला  कोई  नहीं  है 
सदियों  से  मैं  कुचला  जाता   हूँ  
मेरी  आवाज़  का  दमन  होता  है 
मुझ पर लाठी  चार्ज  होता  है  
मुझ न जाने  कैसी  कैसी 
संज्ञाओं  से  परिभाषित  किया  जाता  है
सबकुछ  सहा  है  मैंने 
मगर  मुझे मिला  कुछ  नहीं, 
क्या मेरा ये युद्ध   कभी समाप्त   होगा ?
क्या  मुझे  कभी  मुक्ती  मिलेगी ? शायद   नहीं, 
क्योंकि  मै  एक आदमी  हूँ  जी  हाँ  एक  आम  आदमी …..